Page 108 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स अनार तक
जब हम लगा मक मस्थमत हमार काबू स बाहर हो रही है और गााँव क
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डॉक्टर क इलाज से कोई र्फायदा नहीं हो रहा है, तो हमने मबना देरी मकए उन्हें
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देवास क प्रमतमष्ठत संस्कार हॉमस्पटल में ले जाने का फसला मकया। यह हमार े
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मलए एक बहुत बडा कदम था, क्योंमक हम गााँव में रहते थे और शहर क हॉमस्पटल
का माहौल हमार मलए मबल्कु ल नया था। हम सभी भाई-बहन ममलकर उन्हें
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देवास लेकर गए। वहााँ हमने डॉ. सुनील शमाष जी स संपक मकया, जो वहााँ क एक
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बहुत ही जाने-माने और अनुभवी डॉक्टर थे। डॉ. शमाष ने तुरंत माताजी को देखा
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और हमें भरोसा मदलाया मक व अपना पूरा प्रयास करग। उनक शब्दों स हम एक
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नई उम्मीद ममली।
हॉमस्पटल
का कमरा हमार मलए
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एक तीथष स्थल बन
गया था। हम सभी
पााँचों बहनें और सातों
भाई ममलकर उनकी
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देखभाल में लग गए। हम सबने अपनी सारी व्यस्तता को पर रखकर अपनी मााँ
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क पास रहने का फसला मकया। कोई दवाई लाने जाता, तो कोई खाना, कोई
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उनका हाथ पकडकर बैठा रहता, तो कोई उनक माथे पर हाथ फरता। हम सबने
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एक-एक पल अपनी मााँ की सवा म मबताया। हम इस समय यह एहसास हुआ
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मक पररवार की ताकत क्या होती है। हमार सभी भाई-बहन, उनक पररवार क
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सदस्य, और यहााँ तक मक हमार बच्चे भी हमार साथ थे। हॉमस्पटल में डॉक्टर
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और नस अपनी ड्यूटी कर रहे थे, लेमकन हम सब अपनी मााँ की सेवा को अपनी
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ड्यूटी मानकर कर रहे थे।
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