Page 112 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स अनार तक
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एक गुरु, एक साथी: श्रीमती साधना चौहान
जीवन क कुछ अध्याय हम ऐस लोगों स ममलवात हैं मजनकी भूममका
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हमार सर्फर में मकसी मील क पत्थर से कम नहीं होती। वे हमार जीवन में एक
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ऐसी गहरी छाप छोड जाते हैं, जो समय क साथ और भी ज़्यादा स्पि होती जाती
है। मेरी आत्मकथा का यह पन्ना एक ऐसी ही अमवस्मरणीय शमख्सयत को
सममपषत है, मजन्होंने मेर जीवन पर
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एक गहरी और अममट छाप
छोडी—श्रीमती साधना चौहान,
मेरी सहकमी, मेरी मागषदशषक और
मेरी सच्ची ममत्र। सन 2006 से
लेकर 2015 तक, लगभग नौ
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साल तक, उनक साथ काम करने
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का जो सौभाग्य मुझ ममला, वह मेर े
जीवन का एक अमूल्य महस्सा है।
साल 2001, जब मैंने शासकीय माध्यममक मवनॏयालय, गोरवा में एक
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मशक्षक क ऱूप म अपना कायषभार संभाला। यह मर कररयर का एक महत्वपूण ष
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दौर था। हमार मवनॏयालय म पहली पाली सुबह 7:30 बजे शुऱू होती थी, और
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हम सब मशक्षक सूयोदय क साथ ही अपने कतव्य-पथ पर मनकल पडते थे। हमार े
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स्टाफ में हम मसर्फ चार लोग थे—मैं, मेर साथी श्री जगदीश वमाष, श्री अनवर
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शाह, और हमारी मवज्ञान की मशमक्षका श्रीमती साधना चौहान। यह छोटा सा
समूह मसर्फ सहकममयों का नहीं, बमल्क एक पररवार का था। हमारी मदनचयाष
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बहुत सरल थी, लेमकन उसमें एक गहरा तालमेल और अपनत्व था।
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