Page 111 - आनंद से अनार तक
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                                आत्मकथा -आनंद स  अनार तक

                     अंत म, वह मदन आ ही गया जब डॉ. मसंघई ने हम खुशखबरी दी।
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              उन्होंने कहा, "आपकी मााँ पूरी तरह ठीक हैं। अब आप इन्हें घर ल जा सकत हैं।"
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              यह सुनकर हमारी खुशी का कोई मठकाना नहीं था। हम सब एक-दूसर को गल  े
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              लगाकर रोने लग। यह खुशी क आसू थे। हम सबने एक साथ ममलकर माताजी
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              को घर ले आए और हमार घर में एक जश्न का माहौल था।
                     यह घटना मर जीवन का एक ऐसा यादगार अनुभव है, मजसे मैं कभी
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              नहीं भूल सकता। यह मसर्फ एक बीमारी और इलाज की कहानी नहीं है, बमल्क
              यह हमार पररवार क अटूट प्रेम और मवश्वास की कहानी है। इस घटना ने हम  ें
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              मसखाया मक जब हम सब एक साथ होते हैं, तो हम मकसी भी चुनौती का सामना
              कर सकत हैं। यह कहानी डॉ. सुनील शमाष जी की ईमानदारी और डॉ. मसंघई जी
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              की कामबमलयत का भी एक प्रमाण है। लेमकन सबसे बढकर, यह कहानी हमारी

              मााँ की उस अटूट इच्छाशमि का प्रमाण है, मजसने उन्हें जीने की महम्मत दी।
              माताजी ने हमार मलए ही नहीं, बमल्क खुद क मलए भी एक नई मज़ंदगी जी है।
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                     इसक बाद मैंने 2006 से 2019 तक अपनी व्यस्तताओ क बीज भी
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              भाइयो क साथ गााँव म मनवास करने वाली मााँ क स्वस्थ का बहुत ख्याल रखा
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              हर शमनवार को उनस ममलने जाना उनकी दवाईया एवं फल पहुचना मरा मप्रय
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              काम बन गया था. जो अगल 13 वर्ो तक मनवाषध ऱूप स चलता रहा. मााँ स दूर
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              रहकर अपने व्यस्तम समय क बावजूद मने मााँ मक सेवा में कभी कोई कोताही
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              नहीं  बरती क्योमक मााँ मेर जीवन का महत्पूण महस्सा रही .
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