Page 115 - आनंद से अनार तक
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                                आत्मकथा -आनंद स  अनार तक

              आगे बढना चामहए, चाहे पररमस्थमतयााँ मकतनी भी मुमश्कल क्यों न हों। उनकी

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              बातों म एक ऐसा जादू था मक वह मनराशा को आशा म, और डर को महम्मत में
              बदल देती थीं। जब भी कोई मशक्षक या छात्र हताश होता था, तो वह उन्हें प्रेररत
              करने का कोई मौका नहीं छोडती थीं। वह कहती थीं, "अगर एक पौधा भी ज़मीन
              को चीर कर बाहर आ सकता है, तो हम इंसान क्यों नहीं।"

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                     हमार वह नौ साल (2006-2015) मुझ आज भी याद हैं। सुबह-सुबह
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              का नाश्ता, ग्राउंड म बठकर चाय, और साधना जी क साथ की गई वह गहरी
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              बातचीत। वह क्षण मर जीवन क सबस अनमोल क्षणों म स हैं। उन्होंने मुझ न
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              कवल एक बेहतर मशक्षक बनना मसखाया, बमल्क एक बहतर इंसान भी बनना
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              मसखाया। उनकी बात मर मन म आज भी गूंजती हैं। जब भी मुझ लगता है मक म  ैं
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              थक गया ह ाँ, या जब भी कोई चुनौती मर सामने आती है, तो मुझ उनक कहे हुए
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              शब्द याद आ जात हैं और मुझ आग बढने की महम्मत ममलती है।
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                     इस आत्मकथा क माध्यम से, मैं श्रीमती साधना चौहान जी का हृदय
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              स आभार व्यि करना चाहता ह ाँ। उन्होंने मर जीवन को एक नई मदशा दी और
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              मुझ एक ऐसी प्रेरणा दी जो हमशा मर साथ रहेगी। उनकी दोस्ती और उनका
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              मागदशन मर मलए एक अनमोल उपहार है। उनक योगदान को म शब्दों म बयां
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              नहीं कर सकता, लमकन म हमशा उनक इस उपकार का ऋणी रह ाँगा। वह मसर्फ
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              एक मशमक्षका नहीं, बमल्क मर जीवन की एक ऐसी मागदशक थीं मजन्होंने मुझ  े
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              रोशनी मदखाई।

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