Page 117 - आनंद से अनार तक
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                                आत्मकथा -आनंद स  अनार तक

                     इन नई शाखाओं म, हमने अपने पाठ्यक्रम का भी मवस्तार मकया।
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              शुरुआत म जहााँ मसर्फ क ं प्यूटर मडप्लोमा और प्रमाण पत्र कोस थे, अब हमने
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              क ं प्यूटर मडप्लोमा क साथ-साथ ग्रेजुएशन क कोस भी शुऱू मकए। यह हमार  े
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              संस्थान क मलए एक बडी उपलमब्ध थी, क्योंमक अब हम छात्रों को एक ही छत
              क नीचे उनकी पूरी स्नातक मशक्षा देने म सक्षम थे, जो हमार ममशन को और भी
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                     इस मवस्तार में मेर पररवार का योगदान भी अमवस्मरणीय रहा। मैंने इस
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              नई मजम्मेदारी को पररवार क सदस्यों क साथ साझा करने का फसला मकया,
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              तामक हम सब ममलकर इस ममशन को आग बढा सक। देवास शाखा का संचालन
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              करने का प्रभार मैंने अपने भतीजे अजुन मसंह ठाक ु र और गोपाल ठाक ु र को मदया।
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              मुझ उन पर पूरा भरोसा था मक व अपनी महनत और लगन स इस शाखा को
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              सफलता की ऊचाइयों तक ले जाएाँगे। इसी तरह, सोनकच्छ शाखा की मजम्मेदारी
              मैंने अपने भतीजे लखन मसंह ठाक ु र को सौंपी।
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                     आज जब म पीछ मुडकर देखता ह ाँ, तो मुझ अपने और अपने पररवार
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              पर बहुत गव होता है। मशवम इंस्टीट्यूट का मवस्तार मसफ इमारतों का बनना नहीं
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              था, बमल्क यह हमार सामूमहक संकल्प, हमार पररवार क मवश्वास और हमार  े
              ममशन की जीत थी। इन शाखाओं क माध्यम स हमने हज़ारों ग्रामीण युवाओं क
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              जीवन को एक नई मदशा दी। यह यात्रा मुझ हमशा याद मदलाती है मक जब हम
              एक साथ ममलकर काम करते हैं, तो कोई भी सपना असंभव नहीं होता।
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