Page 113 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स  अनार तक
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                     सुबह-सुबह मवनॏयालय पहुाँचना हमार मलए मसर्फ एक नौकरी नहीं, बमल्क
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              एक आदत और एक सुकून था। क्योंमक स्कूल सुबह का था, तो हम सब ममलकर
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              स्कूल म ही नाश्ता बनात थे। यह एक अद्भुत अनुभव था। हम सब ममलकर
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              लकडी का चूल्हा जलात, उस पर चाय रखते, और मफर कोई गरमागरम पोहा
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              बनाता, मजसकी खुशबू पूर ग्राउंड म फल जाती, तो कभी सूजी का हलवा बनता,
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              मजसकी ममठास हमार मदन की शुरुआत को और भी ख़ूबसूरत बना देती। इन
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              नाश्ते क बाद, हम सब ग्राउंड म एक पुरानी बच पर बठकर चाय का आनंद लत  े
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              थे। वह समय कवल चाय पीने का नहीं था, बमल्क एक-दूसर क साथ जीवन क
              सुख-दुुःख बााँटने का समय था। हम सब हाँसत थे, मज़ाक करते थे और एक-दूसर  े
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              को समझत थे। जगदीश वमाष अपनी कहामनयों स हम गुदगुदात, अनवर शाह
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              अपनी शांत प्रकृमत स हम सुकू न देत, और साधना जी अपने मवचारों से हमें प्रेररत
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              करती थीं।
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                     इन्हीं मुलाकातों म, मेर और श्रीमती साधना चौहान जी क बीच एक
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              गहरा ररश्ता बन गया। हम दोनों अक्सर लंच ब्रेक म अलग स बठकर कोई गंभीर
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              मवर्य पर चचाष करत थे। हमार बीच की बातचीत कभी कवल स्कूल और बच्चों
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              तक सीममत नहीं रहती थी, बमल्क वह जीवन क हर पहलू को छूती थी। हम
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              समाज की चुनौमतयों पर बात करत, मशक्षा क भमवष्य पर बात करते, और कभी-
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              कभी तो अपनी व्यमिगत उलझनों को भी साझा करते थे। वह एक ऐसी श्रोता
              थीं जो कवल सुनती नहीं थीं, बमल्क मेरी बातों को समझती भी थीं। उनकी सलाह
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              में एक ऐसी सादगी और गहराई होती थी मक वह सीधे मदल को छू जाती थी।
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                     मुझ अच्छ स याद है मक एक समय म अपने काम स बहुत मनराश हो
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              गया था। मवनॏयालय म कुछ प्रशासमनक परशामनयााँ चल रही थीं, और मुझ लग
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              रहा था मक शायद मैं एक मशक्षक क ऱूप में अपने कतषव्यों को ठीक से नहीं मनभा
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