Page 110 - आनंद से अनार तक
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                                आत्मकथा -आनंद स  अनार तक

                     डॉ. शमाष की यह बात हमार मलए मनराशा क अाँधेर में उम्मीद की एक
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              छोटी सी मकरण की तरह थी। हमें एक मौका ममल गया था। हम सबने एक साथ
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              ममलकर तुरंत फसला मलया मक हम माताजी को इंदौर लकर जाएग। हमने मबना
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                                                                   े
              एक पल भी बबाषद मकए, संस्कार हॉमस्पटल देवास स एक एम्बुलस की व्यवस्था
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              की और उन्हें इंदौर क बॉम्ब हॉमस्पटल क मलए रवाना कर मदया। एम्बुलस का
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              सफर हमार मलए एक परीक्षा की तरह था। हम सब भगवान से प्राथषना कर रहे थे
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              मक हमारी मााँ को कुछ न हो। हम बार-बार उनक चेहर को देखते और उनसे बात
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              करते, "मााँ, महम्मत मत हारना। हम आ गए हैं।"
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                     इंदौर पहुाँचकर हमने डॉ. मसंघई स मुलाकात की। व बहुत ही अनुभवी
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              और शांत स्वभाव क डॉक्टर थे। उन्होंने हमारी सारी बात सुनी और माताजी की
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              मस्थमत का जायजा मलया। उन्होंने हम कोई झूठा मदलासा नहीं मदया, लेमकन
              उन्होंने इलाज शुऱू कर मदया। उनक इलाज का तरीका डॉ. शमाष स अलग था।
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                                                            उन्होंने  माताजी  क
                                                            शरीर  को  मज़बूत
                                                            बनाने पर ध्यान मदया।
                                                            अगले  दस  से  बारह
                                                            मदनों तक, हमने देखा

                                                            मक  माताजी  की
                                                                        े
                                                            तबीयत  में  धीर-धीर  े
              सुधार हो रहा है। हर मदन, उनकी आाँखों में एक नई चमक आती थी, और उनक
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              चेहर पर एक हल्की सी मुस्कान लौट आती थी। यह देखकर हमार मदलों को
              सुकून ममलता था।




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