Page 107 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स  अनार तक
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                                 ाँ
                          एक मा का संघर्ष और पररवार का अटूट बंधन

                     जीवन की कहानी म कुछ पन्ने ऐस होत हैं मजन्हें हम कभी भूल नहीं
                                                     े
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              पात। ये पन्ने सुख और दुुःख, आशा और मनराशा, मवश्वास और डर की स्याही
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              से मलख जाते हैं। मेर जीवन में भी एक ऐसा ही अध्याय है, मजसने हमार पूर  े
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              पररवार को एक साथ, एक सूत्र म मपरो मदया। यह कहानी है मसतंबर 2006 की,
              जब हमारी सबसे बडी ताकत, हमारी पूज्य माताजी श्रीमती कशर बाई की
                                                                  े
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              तबीयत अचानक खराब हुई। वह मसर्फ एक बीमारी नहीं थी, बमल्क यह हमार  े
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              पररवार क प्रेम, एकता और अटूट मवश्वास की एक कमठन परीक्षा थी।
                                                                माताजी  हमार  े
                                                         पररवार का आधार स्तंभ
                                                                 े
                                                         थीं। उनक मबना, हमारा
                                                         बडा  पररवार,  मजसम  ें

                                                         सात  भाई  और  पााँच
                                                         बहनें शाममल हैं, अधूरा

              था। उनकी तबीयत अचानक खराब हुई। हम सब मचंमतत हो गए। शुरुआत म   ें
              हमने इसे सामान्य मौसमी बीमारी समझकर गााँव क ही डॉक्टर को मदखाया। हमें
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                                                                       े
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              उन पर पूरा भरोसा था, क्योंमक उन्होंने हमेशा हमार पररवार और गााँव क लोगों
              का इलाज मकया था। डॉक्टर ने उन्हें कुछ दवाइयााँ दीं और हम बताया मक उन्हें
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              जल्द ही आराम ममलगा। हम सब मनमिंत हो गए और उम्मीद करने लग मक वह
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                                                                े
              एक-दो मदन में ही ठीक हो जाएाँगी। लेमकन दो-तीन मदन बीतने क बाद भी उनकी
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              सहत म कोई सुधार नहीं हुआ। उनकी हालत धीर-धीर मबगडती जा रही थी, और
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              हमार मन म मचंता की एक गहरी लकीर मखंचती जा रही थी। उनक चेहर पर पीडा
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              साफ झलक रही थी, और उनकी सााँसें धीर-धीर तेज़ होने लगी थीं।
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