Page 104 - आनंद से अनार तक
P. 104

आत्मकथा -आनंद स  अनार तक
                                                 े

                                                    े
                                                              े
                          े
              पुरस्कार ने मुझ वह मवश्वास मदलाया मजसने आग चलकर मुझ भारत स्क ू ल और
                                    ै
              मशवम ब्रेनी मबयर स्क ू ल जस संस्थानों की स्थापना करने और 'जल चैंमपयन'
                                      े
                ै
              जसी सामामजक भूममकाओं को मनभाने का साहस मदया।
              5. एक मशक्षक की साथषकता
                                                                  ष
                     आज जब म पीछ मुडकर देखता ह ाँ, तो एयर इंमडया अवाड की वो रॉफी
                               ैं
                                   े
                                                       े
              कवल अलमारी की शोभा नहीं बढाती, बमल्क मुझ हर मदन याद मदलाती है मक
               े
                                                  े
                                                                            े
              मशक्षा का असली अथष क्या है। एक मशक्षक क मलए सबस बडा पुरस्कार उसक
                                                            े
              छात्र की सफलता है, लेमकन जब वैमश्वक स्तर पर आपकी मेहनत को सराहा
                             े
              जाता है, तो वह पूर मशक्षक समाज क मलए गौरव का मवर्य बन जाता है।
                                           े
                                 े
              गोरवा का वह समय मेर जीवन की नींव है। वहीं मैंने सीखा मक अभावों में ही
              आमवष्कार जन्म लेते हैं।







              ====================================











              94 | P a g e
   99   100   101   102   103   104   105   106   107   108   109