Page 114 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स अनार तक
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पा रहा ह ाँ। मर मन म नकारात्मकता का एक गहरा बादल छा गया था। मने एक
मदन लंच ब्रेक म साधना जी स अपनी मनराशा साझा की। मने उनस कहा, "साधना
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जी, मुझ लगता है मक म यह काम ठीक स नहीं कर पा रहा ह ाँ। म मनराश ह ाँ। मुझ े
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लगता है मक हमारी मेहनत का कोई फल नहीं ममल रहा है।" मेर इन शब्दों में मेरी
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सारी हताशा थी।
उन्होंने मरी बात को बहुत ध्यान स सुना, और मफर उन्होंने मुझ एक
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बहुत ही गहरी और प्रेरक बात कही। वह बोलीं, "जीवन में मनराशा तब आती है
जब हम अपनी उम्मीदों को अपनी मेहनत से ज़्यादा बडा बना लेते हैं। आप जो
काम कर रहे हैं, वह मसर्फ एक नौकरी नहीं है, बमल्क यह एक तपस्या है। इन
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बच्चों क भमवष्य को संवारने का काम कोई मामूली काम नहीं है। एक बीज जब
ज़मीन में बोया जाता है, तो हमें तुरंत पेड नहीं मदखता। हमें धैयष रखना पडता है।
हम पानी डालते हैं, देखभाल करते हैं, और मफर एक मदन वह बीज एक मवशाल
पेड बन जाता है। उसी तरह, हमारी मेहनत भी है। जब भी आपको लगे मक आप
हार रहे हैं, तो इन बच्चों की आाँखों में देखना। उनकी आाँखों में आपक मलए जो
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सम्मान है, वही आपकी सबसे बडी ऊजाष है।"
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उनक यह शब्द मर मदल को सीधे छू गए। उनकी बातों ने मर अंदर एक
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नई ऊजाष और उत्साह का संचार मकया। मुझ लगा मक म अकला नहीं ह ाँ और मर े
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काम का बहुत गहरा अथष है। उस मदन क बाद, मैंने अपने काम को एक नए
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दृमिकोण स देखना शुऱू मकया। मने मनराशा को पीछ छोड मदया और उत्साह क
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साथ काम मकया।
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साधना जी क मवचार बहुत ही प्रेरक और सकारात्मक थे। वह हमशा
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मवनॏयालय की प्रगमत क बार में सोचती थीं। वह कवल मवज्ञान पढाती नहीं थीं,
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बमल्क उस जीवन क हर पहलू म लागू करती थीं। वह कहती थीं मक हम हमशा
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