Page 98 - आनंद से अनार तक
P. 98

े
                                आत्मकथा -आनंद स  अनार तक

                                         ै
               े
              क सभी गााँवों का दौरा करने का फसला मकया। हमारी इस यात्रा में हमने लगभग
              150 से ज़्यादा गााँवों का दौरा मकया। यह यात्रा कवल कुछ मदनों की नहीं, बमल्क
                                                    े
              कई महीनों की थी, जो हमार मलए एक तपस्या की तरह थी।
                                    े
                                                  े
                                        ें
                     गााँव-गााँव घूमत हुए, हम कई तरह क अनुभव हुए। कुछ जगहों पर हम  ें
                                 े
                            े
                                                         े
              संदेह की नज़रों स देखा गया, क्योंमक लोग इस तरह क प्रयास से पररमचत नहीं
              थे। लेमकन जब हम उन्हें अपने ममशन क बार में बताते, तो उनकी आाँखों में
                                               े
                                                   े
              उम्मीद की एक नई चमक मदखती थी। हमने लोगों स उनक जीवन क संघर्ों,
                                                         े
                                                             े
                                                                      े
                                     े
                                                   ें
              उनकी उपलमब्धयों और उनक सुझावों क बार म बात की। हमने समाज क बुजुगों
                                                 े
                                                                       े
                                              े
                                                            े
                े
                                                                   े
              स उनका आशीवाषद मलया और युवाओं को इस पमत्रका स जुडने क मलए प्रेररत
              मकया। यह यात्रा कवल एक सवेक्षण नहीं थी, बमल्क यह हमार और हमार समाज
                                                                       े
                                                              े
                            े
              क बीच एक भावनात्मक ररश्ता बना रही थी।
               े
                              े
                                                                        ै
                     इस यात्रा क बाद, हमने इस पमत्रका को एक नया आयाम देने का फसला
                                                े
                                                                          ैं
                          ैं
              मकया। हमने सधव राजपूत क्षमत्रय समाज क राष्रीय अध्यक्ष, श्री तज मसंह सधव
                                                                  े
                         े
              अम्लाताज स मुलाकात की। उन्होंने हमार इस प्रयास की बहुत सराहना की और
                                               े
                 ें
                                                           े
              हम पूरा समथषन देने का आश्वासन मदया। उनकी प्रेरणा स, हमने अपनी पमत्रका
                                                                       े
              को एक राष्रीय मंच देने का फसला मकया, और इसे त्रैमामसक पमत्रका क ऱूप में
                                     ै
              प्रकामशत करने का मनणषय मलया।
                                                                    े
                             े
                     यह हमार मलए एक बहुत बडा क्षण था। हमने गााँव-गााँव स जुटाई गई
              कहामनयों, लखों और कमवताओं को संकमलत मकया। हमने रातों-रात मेहनत
                         े
              की, तामक पमत्रका समय पर प्रकामशत हो सक। अंत म, वह मदन आ ही गया जब
                                                        ें
                                                 े
              हमारी महनत रंग लाई। मदनांक 4 अप्रैल, 2004 को, हमारी पमत्रका 'सैंधव प्रभात'
                     े
              का भव्य मवमोचन मशवम मडग्री कॉलेज टोंक खुदष  में मकया गया। इस कायषक्रम
              88 | P a g e
   93   94   95   96   97   98   99   100   101   102   103