Page 96 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स अनार तक
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समाज सेवा का नया अध्याय: 'सैंधव प्रभात' का प्रकाशन
जीवन म कुछ ऐस क्षण आत हैं, जब एक छोटा सा मवचार एक बड े
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आंदोलन का ऱूप ल लता है। मर जीवन म भी ऐसा ही एक क्षण तब आया, जब
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समाज सवा का हमारा जुनून कवल व्यमिगत प्रयासों तक सीममत नहीं रहा,
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बमल्क एक ऐस मंच क ऱूप म सामने आया मजसने पूर समाज को एकजुट कर
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मदया। यह कहानी है हमारी सामामजक पमत्रका 'सैंधव प्रभात' की, मजसका जन्म
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एक सपने स हुआ और मजसने मरी मज़ंदगी की सबस बडी उपलमब्ध बनकर
उभरा।
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बात उन मदनों की है, जब मैं, मेरा सबसे अच्छा दोस्त सुरि सधव, और
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हमार साथी राज भंवर
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मसंह ठाक ु र, रोटरी
क्लब क माध्यम से
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सामामजक कायों म पूरी
तरह से समक्रय थे। हम
लगातार लोगों से ममल
रहे थे, उनकी
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समस्याओं को सुन रहे थे, और उनक जीवन में एक सकारात्मक बदलाव लाने
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की कोमशश कर रहे थे। इसी दौरान, हमने महसूस मकया मक सधव राजपूत क्षमत्रय
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समाज में एक गहरी कमी है—एक ऐसा मंच जो लोगों को एक-दूसर स जोड,
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उनकी उपलमब्धयों को सबक सामने लाए और उनकी समस्याओं को सही जगह
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पर उठाए। समाज में मबखराव था, लोग अपने-अपने गााँव और शहरों में मसमट े
हुए थे, और उनक बीच संवाद का कोई सशि माध्यम नहीं था।
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