Page 94 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स अनार तक
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एक दखद अध्याय: भाभी का असमय मनधन
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(मदनांक 08 फरवरी, 2003)
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जीवन म कुछ घटनाए ऐसी होती हैं जो हम अंदर तक झकझोर देती हैं।
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ये घटनाएाँ हमें मसखाती हैं मक जीवन मकतना अमनमित है और ररश्तों की डोर
मकतनी नाज़ुक। मर जीवन म भी ऐसा ही एक दुखद और हृदयमवदारक अध्याय
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तब आया, जब हमें एक ऐसे मप्रयजन को खोना पडा, मजसकी कमी आज भी
हमार पररवार म महसूस होती है।
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मदनांक 08 फरवरी, 2003 को,
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हमार पररवार म एक दुखद घटना
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घटी—मेर भाई श्री मवक्रम मसंह
ठाक ु र की धमषपत्नी और मेरी
भाभीसा श्रीमती मचंता बाई ठाक ुर
का मनधन हो गया।
हमारा पररवार एक
संयुि पररवार था, जहााँ हम सब
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एक-दूसर स बहुत गहर स जुड हुए
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थे। हर सुख-दुुःख म हम सब एक
साथ खड होते थे। जब हमें यह पता चला मक भाभीसा को कसर जैसी एक
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खतरनाक और जानलेवा बीमारी ने जकड मलया है, तो हमार पूर पररवार पर दुुःख
का पहाड टूट पडा। उनकी पीडा देखकर हमारा मदल बहुत दुखी होता था, लेमकन
हमने महम्मत नहीं हारी। मैं और मेर बड भाई श्री सज्जन मसंह ठाक ु र ने उनका
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इलाज कराने म कोई कसर नहीं छोडी। हम उन्हें बहतर इलाज क मलए इंदौर ल े
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गए, जहााँ हमने हर संभव प्रयास मकया मक व ठीक हो जाए।
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