Page 88 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स अनार तक
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मुझ जो वतन ममल रहा था, वह मर खचों क महसाब स बहुत कम था। मने यह
तय कर मलया था मक मैं इस नौकरी को स्वीकार नहीं कऱूगा, क्योंमक मैं अपने
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सपनों को मकसी नौकरी क मलए कुबाषन नहीं करना चाहता था।
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लमकन जीवन म कुछ ररश्त ऐस होत हैं जो हम सही रास्ता मदखात हैं,
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और मेरी पत्नी, श्रीमती ममता ठाक ु र, ने उस समय मेरी सबसे बडी मागषदशषक
की भूममका मनभाई। जब मने उन्हें अपनी सरकारी नौकरी छोडने का फसला
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बताया, तो उन्होंने मुझ बहुत धैयष स समझाया। उन्होंने मुझस कहा, "यह मसफ
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एक नौकरी नहीं, बमल्क आपक समाज सवा क ममशन को और भी मज़बूत करने
का एक अवसर है। सरकारी नौकरी से आप एक मनमित आय प्राप्त कर सकते हैं,
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मजसस आप अपनी संस्थाओं पर और भी ज़्यादा ध्यान कमित कर सकग। इसक
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अलावा, एक सरकारी मशक्षक क ऱूप में आपकी मवश्वसनीयता और सामामजक
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प्रभाव और भी बढ जाएगा।"
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मरी पत्नी की दूरदमशता और बुमद्मत्ता ने मर मवचारों को पूरी तरह स े
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बदल मदया। मुझ यह एहसास हुआ मक वह सही कह रही थीं। यह नौकरी मर े
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मलए कवल एक आजीमवका का साधन नहीं, बमल्क मेर उनॏयमी ममशन का एक
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मजबूत स्तंभ बन सकती थी। उनका समथषन और प्रेरणा मर मलए वह शमि थी,
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मजसने मुझ कम वतन की परवाह मकए मबना इस नौकरी को स्वीकार करने क
मलए तैयार कर मदया।
आज जब म पीछ मुडकर देखता ह ाँ, तो मुझ अपनी पत्नी क उस
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मागदशन पर बहुत गव होता है। एक उनॏयमी स एक मशक्षक बनने का यह सफर
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मर जीवन का एक महत्वपूण मोड था। इस मनणय ने मुझ यह मसखाया मक जीवन
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म संतुलन मकतना ज़ऱूरी है। यह नौकरी मरी पहचान का एक महस्सा बन गई,
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मजसने मर ममशन को एक नई मदशा दी और मुझ एक बहतर इंसान बनाया।
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