Page 84 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स अनार तक
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को सवारने म अपनी ओर स हर संभव सहायता दी। उस पररवार ने जो मुझ दुआएं
दीं, मरा मानना है मक आज डॉ. अनार मसंह ठाकुर की जो भी प्रगमत है, वह उन्हीं
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मनस्वाथष दुआओं का फल है।
6. दुआओं का प्रमतफल
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आज म बहुत खुश ह ाँ। वह मकान आज भी तहसील रोड पर खडा है,
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लमकन मर मलए वह कवल एक संपमत्त नहीं, बमल्क मेर और मेर भाई क साहस
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की गवाही है। वह घटना मसखाती है मक जब आप मकसी की डूबती हुई कश्ती
को मकनारा देते हैं, तो खुदा आपकी कश्ती को कभी डूबने नहीं देता।
"सौदा तो जमीनों का हुआ था, मगर मुनाफा दुआओं में ममला। वह 11 लाख
51 हजार की कीमत आज करोडों की खुमशयों में बदल चुकी है।"
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बा़िार क सौदों म अक्सर मुनाफ़ा गगना जाता ह, पर असल रईस
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वही ह, जजसन डूबत हए का हाथ थामा ह।"
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"जब आगथाक चक्रव्यूह न घरा, तो बड़े भाई की ढाल समली, उनक
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भरोसे की एक ककरण से, अंधेरों म भी मिाल समली।"
"मकान की रजजस्री तो मह़ि काग़़िों का एक दहस्सा थी, बच्चों
की तालीम का ज़िम्मा उठाना, असल मोहब्बत का ककस्सा थी।"
"सौदा भले ही लाखों का था, पर मुनार्ा करोड़ों की दुआओ म
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समला, औरों क आसू पोंछन का ससला, मुझे अपनी तरक्की की
राहों म समला।"
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