Page 73 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स  अनार तक
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              मलए एक ऐसा ररश्ता तय मकया, मजस पर मुझ पूरा भरोसा था। मरा मववाह ग्राम
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              कलोद, पोस्ट कमलापुर, तहसील बागली, मजला देवास में रहने वाले श्री सूरज
              मसंह  सधव और श्रीमती शकुं तला बाई सधव की पुत्री ममता ठाक ु र उर्फ सोनू से
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              मदनांक 18 अप्रैल 1998 को   संपन्न हुआ।
                     आमखरकार वह शुभ मदन आ ही गया। मदनांक 18 अप्रैल, 1998 को,

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              हमारा मववाह हुआ। यह मदन मर जीवन का एक अमवस्मरणीय और सबस       े
              महत्वपूण मदन था। उस मदन, मैंने मसफ एक जीवनसाथी नहीं पाया, बमल्क एक
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              ऐस पररवार का महस्सा भी बन गया मजसने मुझ और मर पररवार को भरपूर स्नेह
              और सम्मान मदया। मेरी पत्नी ममता, उर्फ सोनू, ने हमार घर में कदम रखकर एक
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              नई रौनक ला दी। उनकी सरलता, समझदारी और समपषण ने मेर जीवन को एक
              नई मदशा दी।
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                     यह मववाह कवल दो व्यमियों का ममलन नहीं था, बमल्क यह मेर जीवन
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              क एक नए अध्याय का आरंभ था। एक तरफ मर क ं धे पर उच्च मशक्षा को पूरा
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              करने और कररयर बनाने की मज़म्मेदारी थी, वहीं दूसरी तरफ मर साथ एक
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              जीवनसाथी थी, मजसने मर हर संघर् और हर सफलता म मरा साथ देने का वादा
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              मकया था। यह मववाह मर मलए एक बहुत बडा सहारा और प्रेरणा स्रोत बन गया।
              मर पररवार का प्यार और मरी पत्नी का साथ पाकर मुझ ऐसा महसूस हुआ मक
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              अब म मकसी भी चुनौती का सामना कर सकता ह ाँ।
              आज जब म पीछ मुडकर देखता ह ाँ, तो मुझ यह एहसास होता है मक मर बड भाई
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              और मर ससुर का वह मनणय मकतना सही था। उन्होंने मर मलए मसफ एक ररश्ता
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              नहीं चुना, बमल्क एक ऐस जीवनसाथी को चुना, मजसने मर जीवन को पूण मकया।
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              यह मववाह मेर मलए एक नए जीवन का आरम्भ था, जहााँ म अपने सपनों को पूरा
              करने क साथ-साथ एक सुखी और समृद् पाररवाररक जीवन भी जी सकता था।
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