Page 75 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स अनार तक
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संस्था की ज़ऱूरत है जो न कवल तकनीकी मशक्षा दे, बमल्क युवाओं को
आत्ममनभषर भी बनाए।
चचाष क बाद, हमने सवषसम्ममत से यह मनणषय मलया मक हमें एक मशक्षण
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समममत का गठन करना चामहए। इस मनणषय क साथ ही "गुरुक ु ल मशक्षा मवकास
समममत" का जन्म हुआ। हमने अपनी समममत का नाम गुरुकु ल रखा, क्योंमक हम
चाहत थे मक हमारी संस्था प्राचीन भारतीय मशक्षा प्रणाली की तरह, गुरु-मशष्य
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परंपरा पर आधाररत हो, जहााँ मसफ ज्ञान नहीं, बमल्क संस्कार भी मदए जाए।
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इसक बाद, हमने अपनी समममत को कानूनी ऱूप स मान्यता मदलाने क
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मलए सभी ज़ऱूरी कदम उठाए। हमने फॉम और सोसाइटी को उज्जन म पंजीकृत
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करवाया। इस प्रमक्रया म हम कुछ मुमश्कल भी आई ं , लमकन हमारा संकल्प इतना
मजबूत था मक हमने हर चुनौती का सामना मकया। गुरुकु ल मशक्षा मवकास समममत
का मुख्य उद्देश्य बहुत स्पि और दृढ था: "दुरुस्थ ग्रामीण अंचल में तकनीकी
मशक्षा का प्रचार-प्रसार करना।" हमारा मानना था मक तकनीकी मशक्षा ही वह
साधन है मजसस हम ग्रामीण युवाओं को सशि बना सकत हैं और उन्हें रोज़गार
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क नए अवसर प्रदान कर सकते हैं।
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गुरुकुल मशक्षा मवकास समममत का गठन मर और मर सामथयों क मलए
कवल एक संस्था का मनमाषण नहीं था, बमल्क यह हमार सपनों और हमार े
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सामूमहक संकल्प का प्रतीक था। हम सबने ममलकर यह फसला मकया था मक
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हम अपने क्षत्र क युवाओं को एक ऐसा मंच देंग, जहााँ वे न कवल ज्ञान प्राप्त कर
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सक, बमल्क अपने भमवष्य को भी खुद गढ सक। इस समममत क गठन ने मर े
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जीवन को एक नया अथष मदया और मुझ यह मसखाया मक जब एक अच्छा उद्देश्य
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होता है, तो लोग अपने आप जुडत चल जात हैं।
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