Page 15 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स अनार तक
बारह भाई-बहनों क साथ बडा होना, एक ऐसी परवररश थी मजसने मुझ े
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साझा करने, धैयष रखने और एक-दूसर का सहारा बनने की कला मसखाई। हर
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खुशी दुगुनी हो जाती थी और हर दुख आधा हो जाता था। यह पररवार ही मरी
पहचान है और मर व्यमित्व की सबस मजबूत नींव है। आज भी जब म पीछ े
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मुडकर देखता ह ाँ, तो मुझ यह एहसास होता है मक मने एक ऐस पररवार म जन्म
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मलया, मजसने मुझ जीवन की हर चुनौती का सामना करने की महम्मत और
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हौसला मदया।
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"बारह मचराग, एक ही आाँगन, और संस्कारों की एक ही लौ, जहााँ बाँटता
था दुुःख आधा-आधा, और खुमशयााँ होती थीं सौ।"
"सात भाइयों का साहस, पााँच बहनों का दुलार, यही है मेरी असली पूजी,
ाँ
यही मेरा संसार।"
"मपता की कमी को बड भाई ने मजम्मेदारी से भरा, मााँ क आाँचल ने हमें
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संघर्ों में भी मनडर रखा।"
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"एक छत क नीचे बारह सपनों का पलना, यही थी वो पाठशाला, मजसने
मसखाया साथ चलना।"
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