Page 12 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स  अनार तक
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                                      जीवन पररचय


              एक पररचय: आनंद स अनार तक का सफर
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                     1 जुलाई, 1971 को मध्य प्रदेश की शांत और हरी-भरी भूमम पर, ग्राम
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              बरदु म एक मध्यमवगीय पररवार म मरा जन्म हुआ। मर मपता, श्री प्रह्लाद मसंह
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              ठाक ु र, एक मेहनती मकसान थे, मजनका जीवन कृमर् और ममट्टी स जुडा था। मरी
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              माता, श्रीमती कशर बाई ठाक ु र, ने घर को प्रेम और संस्कारों स सींचा। मर बचपन
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              का नाम आनंद मसंह ठाक ु र था, एक ऐसा नाम मजसने मेर बचपन क मदनों में
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              हमशा खुशी और उमंग भरी।
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                     देवास मजल की टोंकखुदष तहसील म मस्थत, मरा गााँव बरदु और पोस्ट
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              जमोमनया, मेर बचपन की अनमगनत यादों का गवाह है। खेतों की ममट्टी की सौंधी
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              खुशबू, हररयाली से भर खेत और गााँव का सरल जीवन, ये सब मेर व्यमित्व की
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              नींव बने। मर मपता क मकसानी क पेश ने मुझ महनत का महत्व मसखाया और
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              मरी माता क संस्कारों ने मुझ नैमतकता और ईमानदारी का पाठ पढाया।
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                     मरा शमक्षक सफर मर गााँव स ही शुऱू हुआ। प्राथममक और माध्यममक
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              मशक्षा क मलए मुझ हर मदन ग्राम जमोमनया, जो मेर गााँव से मात्र 3 मकलोमीटर
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              की दूरी पर था, पैदल जाना पडता था। उन मदनों का सफर मसफ स्कूल जाने का
              रास्ता नहीं था, बमल्क वह प्रकृमत क बीच ज्ञान अमजत करने का एक अनुभव
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              था। इस दौरान, मरी दुमनया खल क मदान तक ही सीममत थी, जहााँ मैं अपने
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              दोस्तों धीरज मसंह चोपडा और मनोहर मसंह जागीरदार क साथ खो-खो और
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              कबड्डी जस पारंपररक खलों का आनंद लता था। इन दोस्तों क साथ मबताए गए
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              पल मेर जीवन क सबसे यादगार और अनमोल क्षण रहे। इन खलों ने मुझ मसफ
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              शारीररक ऱूप स ही मजबूत नहीं बनाया, बमल्क टीम भावना और हार-जीत को
              स्वीकार करने की सीख भी दी।
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