Page 13 - आनंद से अनार तक
P. 13
े
आत्मकथा -आनंद स अनार तक
े
हाई और हायर सेकडरी की मशक्षा क मलए मैंने टोंकखुदष का रुख मकया,
ें
े
े
जहााँ मरा दृमिकोण और व्यापक हुआ। इसक बाद, स्नातक और स्नातकोत्तर की
े
ें
े
े
पढाई क मलए मैंने मसहोर क पी. जी. महामवनॏयालय म कदम रखा। यहााँ क अनुभव
े
ने मुझ एक नई मदशा दी। ज्ञान की तलाश यहीं नहीं रुकी और मने अपनी
ैं
े
े
पीएच.डी. की मशक्षा क मलए प्रदेश की राजधानी भोपाल को चुना। यह सफर मर े
े
मलए मसफ मडग्री हामसल करने का माध्यम नहीं था, बमल्क जीवन क हर मोड पर
ष
े
कुछ नया सीखने और खुद को बहतर बनाने का प्रयास था।
यह पररचय, मर जीवन की शुरुआत है। आनंद स डॉ. अनार मसंह ठाकुर
े
े
े
े
बनने का मेरा यह सफर कई उतार-चढावों, संघर्ों, और सफलताओं स भरा है।
े
े
यह कहानी कवल एक व्यमि क जीवन की नहीं है, बमल्क एक ऐसे सफर की है
े
जो ग्रामीण पररवश स मनकलकर सपनों को पूरा करने की प्रेरणा देता है।
े
"खेतों की ममट्टी ने मेहनत मसखाई, मााँ की ममता ने संस्कार मदए, नाम भले
े
ें
े
ही बदला हो वि क साथ, पर जड आज भी उसी जमीं स जुडी हैं।" —
े
यह मेर मपता की मकसानी और माता क संस्कारों क प्रमत सम्मान प्रकट
े
े
करता है।
"आनंद स अनार बनने की यात्रा, महज़ एक नाम का बदलना नहीं है, यह
े
एक ग्रामीण पररवेश क सपनों का, हकीकत क आसमान में ढलना है।" —
े
े
े
े
ें
े
यह मेर पूर जीवन पररचय क सार को एक सूत्र म मपरोता है।
ाँ
े
"गााँव की पगडंमडयों स शहर क ऊचे मशखरों तक का सफर, कवल पैरों
े
े
की थकान नहीं, बमल्क इरादों की उडान की कहानी है।"
3 | P a g e

