Page 14 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स अनार तक
मेर पररवार की पृष्ठभूमम: बारह भाई-बहन
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हर व्यमि क जीवन म उसक पररवार की पृष्ठभूमम, उसकी जडों की तरह
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होती है। मेर मलए मेरा पररवार कवल एक घर नहीं, बमल्क एक पूरा संसार था—
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एक ऐसा संसार जो प्रेम, संघर्, और अटूट बंधन स गढा गया था। उस दौर म,
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हमारा पररवार कोई छोटा पररवार नहीं था, बमल्क हम बारह भाई-बहन थे—सात
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भाई और पााँच बहनें। आज क समय में यह बात शायद ही कोई सोच पाए, लेमकन
उस समय हमारा घर हमेशा हाँसी-खुशी और उत्साह स भरा रहता था।
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एक ही छत क नीचे इतने सार बच्चों का एक साथ बडा होना अपने
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आप म एक अनोखा अनुभव था। घर म कभी सन्नाटा नहीं होता था। हर कोने स े
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बच्चों की आवाज़, खलकूद, और शरारत सुनाई देती थीं। हम सब ने ममलकर
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हाँसना, रोना, खेलना और पढना सीखा। बड भाई-बहनों ने छोटे भाई-बहनों की
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मजम्मेदारी उठाई, और छोटे भाई-बहन अपने बडों का सम्मान करते थे। यह
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आपसी तालमल और स्नेह ही हमार पररवार की सबसे बडी ताकत थी।
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हम बारह भाई-बहनों क नाम इस प्रकार हैं:
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• बहनें: सबसे बडी बहन शांता कुं वर, उसक बाद भूरा बाई, लीला बाई,
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ममठू बाई, और कला बाई।
• भाई: सज्जन मसंह ठाकुर, मवक्रम मसंह, गजराज मसंह, मानमसंह, कुमर
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मसंह, अनार मसंह (मैं), और सुमर मसंह।
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यह नाम मसफ नाम नहीं, बमल्क एक-दूसर क प्रमत सम्मान, मजम्मेदारी और
प्रेम का प्रतीक थे। मेर बड भाई, मवशर्कर श्री सज्जन मसंह ठाकुर, ने मपता क
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जाने क बाद पररवार की मजम्मदारी को पूरी तरह मनभाया। वहीं मरी माता, श्रीमती
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कशर बाई ठाकुर, ने हम सबको प्रेम और संस्कारों स सींचा। हमारा घर एक
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पाठशाला था, जहााँ हर मदन हम जीवन क नए सबक सीखते थे।
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