Page 124 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स अनार तक
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एक सच्चा साथी: श्री सुरि मसंह सधव
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मेरी आत्मकथा क इस सफर में, मैंने उन सभी लोगों का मज़क्र मकया है
मजन्होंने मर जीवन को संवारा है। माता-मपता, भाई-बहन, मशक्षक, और यहााँ तक
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मक मर छात्र भी। लमकन एक ऐसा अध्याय है जो मर जीवन की कहानी को अधूरा
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छोड देगा, अगर मैं उसका उल्लेख न कऱू। यह अध्याय मेर सबसे अच्छ दोस्त,
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मर सुख-दुुःख क साथी, और मेर मागषदशषक श्री सुरि मसंह सधव का है। उम्र में
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मुझस बहुत छोट होने क बावजूद, उन्होंने मेर जीवन को ऐसी मदशा दी है, जो
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मकसी और ने नहीं दी। वह मेर मलए मसर्फ एक ममत्र नहीं, बमल्क एक ऐसा इंसान
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हैं मजनकी उपमस्थमत स मरा जीवन हमशा अच्छा ही हुआ है।
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हमारी मुलाकात की कहानी बहुत ही मदलचस्प है। जब म रोटरी क्लब
टोंक खुदष का गठन कर रहा
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था, तो समाज सवा क जुनून
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ने मुझ कई ऊजाषवान युवाओं
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से ममलवाया। उसी समय मेरी
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मुलाकात सुरि सन्धव स े
हुई। वह अपने गााँव सेकली,
तहसील टोंक खुदष, मजला
देवास क एक युवा थे,
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मजनक अंदर ज्ञान और काम
करने का एक अजीब सा
जोश था। उनकी आाँखें चमकती थीं और उनकी बातों में एक गहरा आत्ममवश्वास
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था। म उनस पहली ही मुलाकात म बहुत प्रभामवत हुआ, क्योंमक उनकी सोच
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कवल अपने तक सीममत नहीं थी, बमल्क समाज और सामहत्य क मलए भी थी।
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