Page 128 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स  अनार तक
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                     यह सब इतनी तज़ी स हुआ मक उन्हें संभलने का मौका ही नहीं ममला।
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              उस रक्टर क अगले महस्से से उनकी मोटर साइमकल को एक ज़ोरदार टक्कर
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                                                                            े
              लगी। टक्कर इतनी भयानक थी मक मोटर साइमकल बुरी तरह स टूट गई और मर  े
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              भाई तथा नारायण मसंह जी दोनों रोड क मकनार, झामडयों में जाकर मगर। उस
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              सुनसान रास्त पर एक चीख और मफर गहरा सन्नाटा छा गया। नारायण मसंह जी
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              को तो कम चोट आई थी, लमकन मर भाई सज्जन मसंह जी को बहुत गंभीर चोट  ें
              आई ं । उनक मसर और पैर म गहरी चोट लगी थी। व ददष स तडप रहे थे और उनकी
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              हालत बहुत खराब थी।
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                     मकसी तरह, पास स गुजर रहे लोगों ने इस हादस को देखा और हम  ें
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              खबर दी। जैसे ही हमें इस घटना का पता चला, हमार पूर पररवार म हडक ं प मच
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              गया। हम सब तुरंत ही देवास क करीम नमसिंग होम हॉमस्पटल की ओर भागे। उस
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              रात का सफर मर मलए मज़ंदगी का सबस लंबा सफर था। हर ममनट, हर पल, हम
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              भगवान स प्राथषना कर रहे थे मक हमार भाई को कुछ न हो। हॉमस्पटल पहुाँचकर
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              हमने उन्हें तुरंत इमरजसी म दामखल करवाया। डॉक्टरों ने उन्हें देखा, उनका इलाज
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              शुऱू मकया, लमकन उनक चेहर पर मचंता की गहरी लकीर थीं। हम लगा मक कुछ
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              तो बहुत गंभीर है।
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                     अगली सुबह, डॉक्टर ने हम बाहर बुलाया और एक ऐसी बात कही
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              मजसने हम अंदर तक महलाकर रख मदया। उन्होंने कहा, "आप अपने भाई क पैर
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              को बचा नहीं पाएाँगे। अगर इनकी जान बचानी है, तो हमें इनका पैर काटना
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              पडगा।" डॉक्टर की यह बात सुनकर हम सभी भाई सदम म आ गए। हम सब ने
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              एक-दूसर की तरर्फ देखा। हमारी आखों म मवश्वास और डर क आसू थे। एक पल
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              क मलए हम लगा मक अब सब कुछ खत्म हो गया है, लेमकन हम हार मानने वाले
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              नहीं थे। मर भाई का पैर हमार मलए कवल एक अंग नहीं था, बमल्क यह उनका
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