Page 131 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स  अनार तक
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                       मशक्षक से समन्वयक तक: एक नया सफर और एक


                                       अममट छाप

                                                                 े
                     जीवन एक नदी की तरह है, जो अलग-अलग घामटयों स होकर गुजरती
                                                                     े
              है, हर मोड पर कुछ नया मसखाती है और कुछ यादें छोड जाती है। मर कररयर
                                                                      े
              का सफर भी कुछ ऐसा ही था, जो 15 साल तक एक ही जगह पर बहता रहा
              और मफर अचानक एक नए मोड पर मुड गया। यह कहानी है मर उस छोट, लेमकन
                                                                      े
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              बहद महत्वपूण सफर की, जो मुझ एक मशक्षक स ब्लॉक एकडममक समन्वयक
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                                                     े
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              (BAC) बना मदया और मुझ कुछ ऐस लोगों स ममलवाया मजनकी छाप मर     े
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              जीवन पर हमेशा क मलए रह गई।
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                     20 अगस्त, 2001 को मैंने शासकीय माध्यममक मवनॏयालय, गोरवा में
                                                            एक मशक्षक क ऱूप
                                                                        े
                                                             ें
                                                            म अपनी यात्रा शुऱू
                                                            की। अगल पंिह वर्ों
                                                                     े
                                                            तक, वह स्कूल मरा
                                                                           े
                                                            दूसरा  घर  बन  गया।
                                                            मैंने  वहााँ  क  बच्चों
                                                                      े
                                                            को  पढाया,  उनक
                                                                            े
              साथ हाँसा-खेला, और एक ऐसा ररश्ता बनाया जो शब्दों म बयां नहीं मकया जा
                                                             ें
                                                                       े
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              सकता। उस स्कूल की धूल, उसकी दीवार, और हर बच्चे की मुस्कान मर मदल
                                                                        े
                           ैं
               ें
              म बस गई थी। म अपने आप को एक मशक्षक क ऱूप म पूरी तरह स ढाल चुका
                                                          ें
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              था और इस भूममका म मुझ बहुत संतुमि ममलती थी।
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