Page 132 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स अनार तक
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लमकन मनयमत को कुछ और ही मंजूर था। 12 जनवरी, 2016 को मुझ े
एक नया आदेश ममला—मुझ जनपद मशक्षा कि, टोंक खुदष में BAC क पद पर
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कायषभार संभालना था। यह खबर मर मलए खुशी और मचंता का ममला-जुला
एहसास लकर आई। खुशी इसमलए मक यह एक पदोन्नमत थी, एक नई मज़म्मेदारी
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थी। मचंता इसमलए मक मुझ उस जगह को छोडना पड रहा था जहााँ मने अपने
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जीवन क सबस अच्छ साल मबताए थे। उस मदन जब मने आमखरी बार स्कूल
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की घंटी बजाई और बच्चों को अलमवदा कहा, तो मरी आख भर आई ं । यह एक
युग का अंत और एक नए युग की शुरुआत थी।
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जब म जनपद मशक्षा कि पहुाँचा, तो मुझ एक मबल्कुल ही नया माहौल
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ममला। जहााँ स्कूल म बच्चों की हाँसी और शोरगुल थी, वहीं यहााँ सरकारी दफ्तरों
की खामोशी और कागज़ों की सरसराहट थी। मर मलए यह सब नया था। मुझ नए
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काम, नए मनयम और नए लोगों क साथ तालमल मबठाना था। शुरुआत म म ैं
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थोडा असहज महसूस कर रहा था, लमकन कुछ ही मदनों म मुझ एक ऐस शख्स
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का साथ ममला मजसने मेर इस सफर को आसान बना मदया।
वह शख्स थे श्री कमल मसंह टांक। मैं उन्हें कवल सहकमी नहीं मानता,
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बमल्क वे मेर बड भाई जैसे थे और मशक्षा क क्षेत्र में मेर मलए मकसी मपतामह से
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कम नहीं थे। जनपद मशक्षा कि में उनक सामनध्य में काम करने का अवसर ममलना
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मर मलए एक बहुत बडा सौभाग्य था। व अपने अनुभव, ज्ञान और सादगी से हर
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मकसी को प्रभामवत करते थे। जब मैं मकसी काम में उलझ जाता या कोई फसला
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नहीं ले पाता, तो व हमशा मर साथ होत। व मुझ मसर्फ सलाह नहीं देत थे, बमल्क
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सही रास्ता मदखात थे। व मुझ यह मसखात थे मक सरकारी काम को कस ईमानदारी
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और समपषण क साथ मकया जाता है। उनकी उपमस्थमत ने मर अंदर एक अजीब
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सी शांमत और आत्ममवश्वास भर मदया था।
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