Page 137 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स अनार तक
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मने उनस अपनी पूरी मज़बूरी बताई। मने उन्हें समझाया मक रोज़ 50
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मकलोमीटर की यात्रा करना मर मलए बहुत मुमश्कल होगा और इसस मर काम
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पर भी असर पडगा। उन्होंने मरी बात को बहुत ध्यान स सुना और मरी मस्थमत
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को समझा। उन्होंने तुरंत ही मरा आवदन स्वीकार कर मलया और मरा आदेश
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शासकीय उच्चतर माध्यममक मवनॏयालय, पटाडी से मजला मशक्षा अमधकारी
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कायाषलय, देवास क मलए मनकाल मदया। मुझ यह देखकर बहुत खुशी हुई मक
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उन्होंने मेरी समस्या को समझा और इतना जल्दी फसला मलया। दो मदन बाद,
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मैंने मजला मशक्षा अमधकारी कायाषलय, देवास म अपनी जॉइमनंग दे दी।
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मर मलए यह बहुत बडी सफलता थी, लेमकन एक बात थी जो मेर मन
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म खटक रही थी। जब म पटाडी स्कूल म अपनी जॉइमनंग देने गया था, तो मैंने
देखा मक वहााँ क बच्चे बहुत मासूम और प्यार थे। वहााँ क मशक्षक भी कम थे।
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मुझ यह जानकर बहुत दुुःख हुआ मक मर जाने क बाद वहााँ क बच्चों को पढाने
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क मलए कोई भी मशक्षक नहीं होगा। एक मशक्षक क ऱूप में, मैं उन बच्चों का
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नुकसान नहीं देख सकता था। मरा मदल यह मानने को तयार नहीं था मक म अपनी
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सुमवधा क मलए उन बच्चों क भमवष्य को खतर म डाल दूाँ। मुझ यह एहसास
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हुआ मक मरा कतव्य मसर्फ अपनी नौकरी करना नहीं है, बमल्क उन बच्चों क
भमवष्य को भी सुरमक्षत करना है।
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मने तुरंत यह फसला मकया मक म पटाडी स्कूल क प्राचायष स बात
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कऱूगा और कोई रास्ता मनकालूगा। म सीधे शासकीय उच्चतर माध्यममक
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मवनॏयालय, पटाडी क प्राचायष श्री भंवर लाल मालवीय जी से ममला। मैंने उनसे
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कहा, "सर, म जानता ह ाँ मक मर जाने क बाद यहााँ क बच्चों को पढाने क मलए
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कोई मशक्षक नहीं होगा। मुझ यह देखकर बहुत दुुःख हो रहा है। म चाहता ह ाँ मक
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