Page 138 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स अनार तक
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आप मकसी स्थानीय मशक्षक से बात कर और उन्हें मेर स्थान पर बच्चों को पढाने क
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मलए बुला लें। उनका वेतन म अपनी जब स दूाँगा।"
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मरी यह बात सुनकर प्राचायष मालवीय जी बहुत हैरान हुए। उनकी आाँखों म ें
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एक अजीब सा सम्मान था। उन्होंने कहा, "सर, ऐसा कोई नहीं करता। आप एक
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मशक्षक क ऱूप म अपने कतषव्यों स बहुत आगे बढकर सोच रहे हैं।" मने उनस कहा,
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"सर, बच्चों का भमवष्य मेर मलए सबसे ऊपर है। मैं नहीं चाहता मक मेर कारण उनका
नुकसान हो।" प्राचायष मालवीय जी ने मरी बात मानी और उन्होंने उसी गाव क एक
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स्थानीय मशक्षक स संपक मकया। उस मशक्षक ने भी बच्चों को पढाने क मलए हा कर
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दी।
इस तरह, मर स्थान पर उस मशक्षक ने पटाडी स्क ूल म बच्चों को पढाना
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शुऱू कर मदया। मने मजला मशक्षा अमधकारी कायालय, देवास में अपना काम जारी
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रखा और रोज़ टोंक खुदष स देवास आना-जाना करता था। मेर मलए यह मसर्फ एक
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नौकरी नहीं थी, बमल्क यह मर जीवन का सबस बडा सबक था। इस घटना ने मुझ े
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मसखाया मक जब हम अपने मदल की सुनते हैं, तो हम सच्चा सुक ू न ममलता है।
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आज भी, जब म उन मदनों को याद करता ह ाँ, तो मर चेहर पर एक मुस्कान
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आ जाती है। वह सफर, वह मुमश्कलें, और वह फसला—यह सब मेर जीवन की सबसे
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यादगार घटनाएाँ हैं। मैं इस आत्मकथा क माध्यम से उन सभी लोगों का आभार व्यि
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करना चाहता ह ाँ मजन्होंने मर इस सफर को आसान बनाया। मर दोस्त राज भंवर मसंह
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और सोहन, मजन्होंने मेरा साथ मदया, श्री राजि मसंह खत्री जी, मजन्होंने मेरी समस्या
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को समझा, और श्री भंवर लाल मालवीय जी, मजन्होंने मेरी बात पर मवश्वास मकया।
लेमकन सबसे बढकर, उन बच्चों का, मजन्होंने मुझ यह मसखाया मक एक मशक्षक का
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मदल कवल मकताबों तक सीममत नहीं होता, बमल्क वह अपने मवनॏयामथषयों क भमवष्य
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में भी बसता है।
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