Page 136 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स अनार तक
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गए। सुबह-सुबह, हम तीनों अपनी कार पर सवार होकर पटाडी क मलए मनकल
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पटाडी गााँव की ओर जात हुए, हमें जल्द ही यह एहसास हो गया मक
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यह सफर मर मलए आसान नहीं होगा। गााँव टोंक खुदष स लगभग 50 मकलोमीटर
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दूर था, और वहााँ तक पहुाँचने का कोई सीधा रास्ता भी नहीं था। हम पगडंमडयों
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और टूटी-फूटी सडकों स होकर गुज़रना पडा। हम सब बात करत रहे, मज़ाक
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करते रहे, लमकन मर मन म एक मचंता थी। मुझ लगा मक रोज़ इस दूरी को तय
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करना मर मलए बहुत मुमश्कल होगा। यह यात्रा कवल शरीर क मलए नहीं, बमल्क
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मानमसक ऱूप से भी थका देने वाली थी।
जब हम पटाडी स्कूल पहुाँचे, तो वहााँ का माहौल बहुत शांत और सुंदर
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था। मने अपनी जॉइमनंग दी और वहााँ क मशक्षकों स ममला। मर दोस्त भी मर साथ
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थे और व भी इस जगह की सुंदरता स प्रभामवत थे। लमकन मर मन म एक ही
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बात थी—अगर मैं यहााँ काम कऱूगा, तो मुझ रोज़ 50 मकलोमीटर की यात्रा
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करनी पडगी। यह न कवल मर मलए मुमश्कल था, बमल्क इससे मेरा पररवार भी
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मचंमतत रहता। मने यह फसला मकया मक म यहााँ काम नहीं कऱूगा, और मुझ े
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मकसी तरह देवास क मजला मशक्षा अमधकारी कायाषलय म स्थानांतरण करवाना
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पडगा।
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जब मैंने यह फसला अपने दोस्तों को बताया, तो उन्होंने मरा पूरा समथषन
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मकया। हम सबने ममलकर यह तय मकया मक हम सीधे देवास जाएाँगे और वहााँ क
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मजला मशक्षा अमधकारी से ममलेंगे। उस समय, देवास क मजला मशक्षा अमधकारी
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श्री राजेंि मसंह खत्री जी थे। व एक बहुत ही ईमानदार और संवदनशील अमधकारी
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क ऱूप म जाने जात थे। हम मबना मकसी देरी क उनक पास पहुाँचे।
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