Page 127 - आनंद से अनार तक
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                                आत्मकथा -आनंद स  अनार तक

                        एक भयानक हादसा: जीवन का सबसे बडा सबक


                     जीवन म कुछ घटनाए ऐसी होती हैं जो हम एक ही पल म हाँसत-खेलते
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              संसार स मनकालकर एक भयानक हकीकत क सामने खडा कर देती हैं। ये घटनाए  ाँ
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              हमें मसखाती हैं मक जीवन मकतना अमनमित है और ररश्तों की डोर मकतनी
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              नाज़ुक। मर जीवन म भी एक ऐसा ही पल आया था, मजसने हमार पूर पररवार
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                                                                      े
              को महलाकर रख मदया। यह कहानी है नवंबर 2010 की, एक सदष शाम की,
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                                                                       े
                                                                     मेर  बड  े
                                                                     भाई  श्री
                                                                       सज्जन
                                                                         मसंह
                                                                     ठाक ु र  क
                                                                            े
                                                                        जीवन
                                                                     को  एक

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              ऐसी परीक्षा में डाल मदया था, जहााँ स वापसी बहुत मुमश्कल थी।
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                     उस शाम, गााँव म चारों ओर शांमत थी। अधेरा धीर-धीर गहरा रहा था
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              और हवा में हल्की-सी ठंडक महसूस हो रही थी। मर बड भाई श्री सज्जन मसंह
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              ठाकुर, जो मर मलए मपता तुल्य हैं, अपने समधी जी श्री नारायण मसंह सधव क
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              साथ टोंक खुदष स अपने गााँव बरदु की ओर मोटर साइमकल स आ रहे थे। रात क
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              लगभग आठ या दस बजे का समय था। उनका सफर सामान्य था, वे आपस में
              बातें कर रहे थे, और उन्हें कोई अंदाज़ा नहीं था मक आग क्या होने वाला है। तभी
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              अचानक, सामने से एक रक्टर, जो टोंक खुदष क मकसी कुशवाहा जी का था,
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              बहुत तज़ गमत स और अमनयंमत्रत होकर उनकी ओर बढा।
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