Page 129 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स  अनार तक
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              सम्मान, उनकी पहचान और उनकी मज़ंदगी थी। हमने डॉक्टर क फसल को तुरंत
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              अस्वीकार कर मदया। हम सबने एक स्वर में कहा, "पैर नहीं कटगा, चाहे जो हो
              जाए।"
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                     हमने तुरंत अन्य डॉक्टरों स सलाह ली और यह तय मकया मक हम उन्हें
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              इंदौर लकर जाएग। मबना एक पल भी बबाषद मकए, हमने उन्हें इंदौर क वमाष
              यूमनयन हॉमस्पटल क मलए रवाना कर मदया। एम्बुलस का सफर हमार मलए एक
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              परीक्षा की तरह था। हम सब डर म थे मक कहीं रास्त म कुछ न हो जाए। हम बार-
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              बार भगवान से प्राथषना कर रहे थे और मेर भाई से बात कर रहे थे, "भाई, महम्मत
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                                                                े
              मत हारना। हम आ गए हैं।" इंदौर पहुाँचकर हमने डॉ. वमाष स मुलाकात की।
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              उन्होंने हमार भाई को देखा और हम भरोसा मदलाया मक व अपना पूरा प्रयास
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                                                                ें
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              करग। उन्होंने तुरंत ही उनका इलाज शुऱू कर मदया। उनक पैर म एक रॉड लगाई
              गई, मजससे उनक पैर को सहारा ममल सक।
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                     डॉ. वमाष की महनत और हमार भाई की इच्छाशमि रंग लाई। उनक
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              इलाज क दस स पंिह मदनों क भीतर ही उनकी तबीयत म सुधार होने लगा। हर
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              मदन, उनकी आाँखों में एक नई चमक आती थी, और उनक चेहर पर एक हल्की
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              सी मुस्कान लौट आती थी। यह देखकर हमार मदलों को सुकून ममलता था। डॉक्टर
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              ने उनक पैर म रॉड लगाकर उनक पैर को बचा मलया था। हॉमस्पटल स छुट्टी क
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                                                                      े
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              मदन, व लकडी क सहार स चल पा रहे थे। हमारी खुशी का कोई मठकाना नहीं
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              था। हम सब एक-दूसर को गल लगाकर रोने लग। यह खुशी क आसू थे।
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                     जब हम हॉमस्पटल से मनकलने लगे, तो मर भाई ने मुझस एक बात कही,
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              मजसने मुझ हैरान कर मदया। उन्होंने कहा, "मुझ घर जाने स पहल एक चार पमहया
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              गाडी चामहए।" मैं जानता था मक यह मसर्फ एक इच्छा नहीं, बमल्क उनकी मज़ंदगी
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              का सबसे बडा फसला था। वे अब तक अपने जीवन में कभी मोटर साइमकल क
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