Page 148 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स अनार तक
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मने इस काम म भी बहुत जल्द महारत हामसल कर ली। म हर कायष को
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सही समय पर और पूरी पारदमशता क साथ करता था। मरा लक्ष्य हमशा एक ही
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था—मशक्षा की गुणवत्ता को बहतर बनाना। मने स्कू लों म जाकर मशक्षकों स े
बातचीत की, उनकी समस्याओं को सुना, और उन्हें हल करने की कोमशश की।
मैं हमेशा मानता था मक एक बेहतर समाज का मनमाषण कवल अच्छी मशक्षा से
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ही हो सकता है, और म अपनी तरर्फ स हर संभव प्रयास कर रहा था।
एक कडवा सच और मानमसक तनाव
मरा काम बहुत अच्छा चल रहा था, लेमकन हर कहानी में एक
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खलनायक होता है। मवकासखंड मशक्षा अमधकारी कायाषलय म ही एक व्यमि
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था, जो मेरी ही समाज का था, और मजसे मैं अपना मानता था। लेमकन, दुभाषग्य
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से, वह मुझ पसंद नहीं करता था। मर काम करने का तरीका, मेरी ईमानदारी और
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मरी लगन उस मबल्कु ल रास नहीं आती थी। वह मर काम स बहुत जलता था।
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उसकी यह ईष्याष मर मलए एक बडी चुनौती बन गई। वह हर छोटी बात पर मुझ े
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रोकने की कोमशश करता, मेर काम में बाधा डालता, और मुझ मानमसक ऱूप स े
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परशान करता।
यह मस्थमत मर मलए बहुत ही असहज थी। म उस व्यमि का सम्मान
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करता था, लेमकन उसका व्यवहार मेर मलए असहनीय था। मैं उस नकारात्मक
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माहौल में काम नहीं कर पा रहा था। काम पर जाना मेर मलए एक बोझ बन गया
था। मुझ लगा मक म अपनी ऊजाष को सही जगह पर नहीं लगा पा रहा ह ाँ। जब
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कोई व्यमि आपक ही अपने समुदाय का होकर आपको पसंद न कर और आपक
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काम में बाधा डाले, तो यह बहुत दुुःखद होता है। मने महसूस मकया मक म इस
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तनावपूण माहौल म काम नहीं कर सकता। मरी मानमसक शांमत और मर काम
की गुणवत्ता दोनों ही प्रभामवत हो रहे थे।
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