Page 156 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स अनार तक
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परीक्षा का मदन आमखरकार आ ही गया। मुझ रवींिनाथ टगोर
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मवश्वमवनॏयालय, भोपाल जाना था। जब म मवश्वमवनॏयालय पररसर म पहुाँचा, तो मेरा
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मदल बहुत ज़ोरों स धडक रहा था। पूर देश स लगभग 300 से 400 छात्र पीएचडी
प्रवेश परीक्षा देने आए थे। हर चेहर पर एक उम्मीद थी, और हर कोई अपने
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भमवष्य को बेहतर बनाने क मलए यहााँ था। इस माहौल को देखकर मैं और भी
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ज़्यादा नवषस हो गया, लेमकन मैंने अपनी महम्मत नहीं खोई।
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मने परीक्षा हॉल म प्रवश मकया और पूरी एकाग्रता क साथ परीक्षा दी।
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मर मदमाग म मसफ एक ही बात थी मक मुझ अपना सवश्रेष्ठ देना है। मने हर प्रश्न
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का उत्तर बहुत ही सोच-समझकर मदया। परीक्षा समाप्त होने क बाद, मैं घर लौट
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आया और नतीजों का बसब्री स इंतज़ार करने लगा। मर मन म उम्मीद और डर
दोनों थे।
एक सुखद ख़बर और अपार खुशी
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कुछ समय बाद, मेर जीवन में एक ऐसी खबर आई मजसने मेरी सारी
थकान और तनाव को दूर कर मदया। मर पास रवींिनाथ टगोर मवश्वमवनॏयालय,
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भोपाल से एक कॉल लेटर आया। मैंने जब उसे खोला, तो मरी खुशी का मठकाना
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नहीं रहा। मरा चयन पीएचडी क मलए हो गया था। मुझ 10 अप्रैल 2015 को
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व्यमिगत साक्षात्कार (पसनल इंटरव्यू) क मलए बुलाया गया था।
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यह मर मलए मकसी सपने क सच होने जसा था। मुझ लगा मक मरी
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मेहनत, मरा संघर् और मरा सपना आमखरकार साकार हो रहा है। मरी आखों म ें
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खुशी क आसू थे। मने तुरंत अपने पररवार और दोस्तों को यह खबर दी। सबने
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मुझ बहुत बधाई दी। मुझ यह एहसास हुआ मक जब हम मकसी लक्ष्य क प्रमत पूरी
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तरह से सममपषत होते हैं, तो पूरी कायनात हम उस हामसल करने म मदद करती
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है।
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