Page 157 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स अनार तक
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साक्षात्कार क मलए, मने पूरी तयारी की। मने अपने मवर्य क बार म ें
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गहन अध्ययन मकया और अपने शोध क मवचारों को व्यवमस्थत मकया।
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साक्षात्कार क मदन, म पूर आत्ममवश्वास क साथ मवश्वमवनॏयालय पहुाँचा। मुझ पता
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था मक अब मुझ कवल अपने ज्ञान और अनुभव को मदखाना है। साक्षात्कार बहुत
अच्छा रहा, और मुझ उसी समय यह एहसास हो गया था मक मरा सपना पूरा हो
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गया है।
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यह मर जीवन का एक ऐसा मोड था मजसने मुझ न कवल एक मडग्री दी, बमल्क
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मर अंदर एक नई ऊजाष और आत्ममवश्वास भर मदया। मुझ आज भी यह घटना
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याद है, और यह मुझ हमशा यह याद मदलाती है मक कभी भी अपने सपनों को
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छोडना नहीं चामहए।
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सपनों क संकल्प और संघर्ष पर
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"पीएचडी कवल एक मडग्री का नाम नहीं, बमल्क वर्ों स संजोए गए एक
मशक्षक क उस अटूट स्वप्न की पररणमत है, मजस उसने संघर्ों की स्याही स े
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मलखा है।"
"गोरवा क मवनॏयालय से भोपाल क मवश्वमवनॏयालय तक का सफर, तनाव
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और धडकनों क बीच मछपे एक अदम्य आत्ममवश्वास की मवजय गाथा है।"
फौलादी, तो 400 की भीड में भी अपनी पहचान और स्थान बनाना
मुममकन हो जाता है।"
"परीक्षा हॉल की वह खामोशी और मदल की वह तेज धडकनें—सब
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गवाह थीं मक एक शोधाथी अपने भीतर की सीमाओं को लांघने क मलए
तैयार था।"
"कॉल लटर का वह मलफाफा जब खुला, तो उसमें कवल साक्षात्कार का
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मनमंत्रण नहीं था, बमल्क मर बरसों क पसीने और समपषण की सुगंध थी।"
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