Page 162 - आनंद से अनार तक
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                                आत्मकथा -आनंद स  अनार तक

                     सन 2016 और सन 2017 का समय मेर जीवन का सबसे कमठन और
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              मेहनती समय था । मने गााँवों म जाकर गहन शोध कायष मकया। म दूरस्थ ग्रामीण
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              अंचलों म गया, जहााँ न सडक थीं और न ही मबजली। मने वहााँ क स्कूलों,
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              मशक्षकों और मवनॏयामथषयों से बात की। मैं यह समझना चाहता था मक मशक्षा की
              नीमतयों और उनक कायाषन्वयन म क्या कममयााँ हैं और उन्हें कस सुधारा जा
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              सकता है। मर शोध ने मुझ यह एहसास कराया मक समस्या मसर्फ सरकारी नीमतयों
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              में नहीं, बमल्क उन पर काम करने वाले लोगों में भी है। मैंने अपने शोध में ग्रामीण
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              मशक्षा क मलए जो हो सकता है वह मकया । इस शोध ने मुझ ग्रामीण भारत क
              मशक्षा पररदृश्य का एक बडा अनुभव मदया ।
                     मसनोमप्सस की स्वीकृमत: एक नई पहचान
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                     मरा संघर् आमखरकार रंग लाया। जब मरी मसनोमप्सस तयार हुई, तो
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              उस ररसचष मडग्री कमटी (आरडीसी) क सामने प्रस्तुत करना था। यह मर जीवन
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              का एक बहुत ही महत्वपूण क्षण था। प्रस्तुमत क दौरान मने पूर आत्ममवश्वास क
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              साथ अपने शोध क बार म बताया और समममत क सवालों का जवाब मदया। मुझ  े
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              पता था मक यह मेरी मेहनत और मेर सपनों का सबसे बडा इमम्तहान था। मेरी
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              मेहनत और मेर आत्ममवश्वास ने समममत को प्रभामवत मकया । मुझ उसी समय
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              मरी मसनोमप्सस की स्वीकृमत ममली। यह मेर मलए मसर्फ एक मसनोमप्सस की
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              स्वीकृमत नहीं थी, बमल्क यह मरी एक नई पहचान का आरंभ था । मैं अब एक
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              मशक्षक स एक शोधाथी बन चुका था
              (12 अप्रैल 2016 से मदसम्बर 2017 )
                     अध्याय 1: सपने की नींव - मसनॉमप्सस की स्वीकृमत
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