Page 165 - आनंद से अनार तक
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                                आत्मकथा -आनंद स  अनार तक

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                     अगल कुछ मदनों तक मने गााँव का दौरा मकया। मने देखा मक वहााँ एक
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              स्कूल तो था, पर उसकी हालत बहुत ख़राब थी। छत टूटी हुई थी और दीवारों
              पर काई जमी हुई थी। सबस दुखद बात यह थी मक स्कूल म बच्चे बहुत कम
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              आते थे। जो आते भी थे, वे आधे मदन क बाद काम क मलए खेतों में चले जाते
              थे।
                     मने ग्रामीणों स बातचीत करना शुऱू मकया। उनकी अपनी समस्याएं थीं।
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              मशक्षा उनकी प्राथममकता में सबसे नीचे थी। वे कहते थे, "बाबूजी, पेट की आग
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              बुझाना ज़ऱूरी है। बच्चा पढेगा तो पेट कस भरगा?" मने उनकी बात सुनी और
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              समझा मक उनकी यह सोच ग़लत नहीं थी। उनक मलए आज की रोटी, कल क
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              भमवष्य से ज़्यादा ज़ऱूरी थी।
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                     यह मेर मलए पहला बडा सबक था। मेरा शोध कवल सरकारी नीमतयों
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              का  अध्ययन  नहीं  था,  बमल्क  ग्रामीणों  की  सोच,  उनक  संघर्  और  उनकी
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              वास्तमवक ज़ऱूरतों को समझना था। मने अपनी नोटबुक म मलखा, "मशक्षा का
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              प्रचार-प्रसार कवल स्कूल खोलना नहीं है, यह मवश्वास पैदा करना है मक मशक्षा
              से उनका जीवन बेहतर हो सकता है।"
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                     मने देखा मक गााँव म बच्चों क पास स्कूल की मकताब भी नहीं थीं। कुछ
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              बच्चे  तो  मबना  जूत-चप्पल  क  स्कूल  आत  थे।  मर  मलए  यह  सब  बहुत
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              हृदयमवदारक था। मैंने रामदयाल जी क साथ ममलकर एक छोटा सा सवेक्षण
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              मकया। हमने हर घर म जाकर यह जानने की कोमशश की मक बच्चे स्कू ल क्यों
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              नहीं आते और उनक माता-मपता मशक्षा को क्यों ज़ऱूरी नहीं मानते।
                     मेरा शोध कायष एक अकादममक प्रोजेक्ट से कहीं ज़्यादा व्यमिगत हो
              गया था। हर बच्चा जो मुझ ममलता, मुझ अपनी बचपन की याद मदलाता। मरी
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              मज़म्मदारी बढ गई थी। मुझ एहसास हुआ मक मरा शोध मसफ डटा और आंकडों
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