Page 170 - आनंद से अनार तक
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                                आत्मकथा -आनंद स  अनार तक

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              कहा मक यह मसर्फ एक अकादममक शोध नहीं है, बमल्क यह एक "सजीव और
              मानवीय दस्तावेज़" है।
                     परीक्षक ने मुझस पूछा, "आपने इस शोध से सबसे बडी सीख क्या ली?"
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                     मैंने मबना सोचे जवाब मदया, "सर, मने सीखा मक भारत क दूरस्थ गााँवों
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              में ज्ञान की कमी नहीं है, बमल्क साधनों और अवसरों की कमी है। और एक
              शोधकताष का सबसे बडा कतषव्य मसर्फ समस्याएाँ उजागर करना नहीं, बमल्क उनक
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                                                                            े
              समाधान का रास्ता भी मदखाना है।"
                     मरा जवाब सुनकर परीक्षक मुस्कुराए। कुछ ही हफ्तों बाद, मुझ सूमचत
                                                                       े
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              मकया गया मक मुझ पीएचडी की मडग्री प्रदान की जा रही है। यह मर जीवन का
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              सबसे गवष का क्षण था। यह मसर्फ एक उपामध नहीं थी, यह मर दो साल क संघर्,
              त्याग और मेहनत का प्रमाण था।
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                     लेमकन मेर मलए सबसे बडा सम्मान तब ममला, जब मुझ उस गााँव क
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              मुमखया का पत्र ममला। उन्होंने मलखा था मक गााँव क लोगों ने मरी महनत और
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              लगन को याद करत हुए एक छोट स स्कूल का नाम मर सम्मान म रखा है। उन्होंने
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              मलखा, "आप हमार मलए मसफ एक शोधकताष नहीं, बमल्क एक मागषदशषक हैं।"
                     यह मडग्री और यह सम्मान मेर मलए कवल व्यमिगत उपलमब्ध नहीं
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              थी, बमल्क यह उन हज़ारों बच्चों का भमवष्य था, मजनकी आाँखों में मैंने सपने
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              देख थे। मरी आत्मकथा का यह अध्याय इस बात का प्रमाण है मक अगर इंसान
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              पूरी लगन और ईमानदारी स मकसी काम को कर, तो वह न कवल अपने सपने
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              पूर कर सकता है, बमल्क समाज क मलए भी एक बडा योगदान दे सकता है।
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                     यह कहानी मेर जीवन की सबसे बडी यात्रा थी, मजसने मुझ मसखाया
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              मक जीवन में सफलता का असली मतलब क्या होता है।
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