Page 174 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स  अनार तक
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                                                                      ैं
                                                                          े
                                                     े
                                  े
                     यह सुनकर मुझ बहुत अच्छा लगा। मुझ एहसास हुआ मक म अकला
              नहीं ह ाँ। मरी यात्रा म मर साथ ये सभी लोग हैं, जो मेर हर कदम पर मेरा साथ देने
                      े
                                                       े
                              ें
                                े
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              क मलए तैयार हैं।
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                       मन में चल रहे मवचार - एक पीछ मुडकर देखना
                     रात का एक पहर बीत चुका था। बाकी लोग सो गए थे, लेमकन मेरी
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                                                                        ें
              आाँखों में नींद नहीं थी। मैं मखडकी क बाहर देखता रहा। स्टशन की लाइट तेजी
                                                             े
                े
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              स पीछ छूटती जा रही थीं, और मेर मन में मेरी मपछली दो साल की यात्रा चल
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              रही थी।
                        े
                                              ैं
                                                                       ें
                     मुझ याद आया, वह मदन जब मने पहली बार एक दूरस्थ गााँव म कदम
                                                                      ैं
              रखा था। गााँव की गरीबी और अमशक्षा देखकर मरा मदल टूट गया था। मने सोचा
                                                    े
              था मक क्या म इस चुनौती का सामना कर पाऊगा? क्या मेरी ररसचष वास्तव में
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                                                   ाँ
              कोई बदलाव लाएगी?
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                                       े
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                     मफर मुझ उन बच्चों क चेहर याद आए, मजनकी आाँखों में मैंने आशा
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              देखी थी। एक छोटी सी बच्ची ने मुझस पूछा था, "सर , आप हमार मलए भी
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                                                े
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              स्कूल बनाओग?" उसका मासूम सवाल मर मलए एक प्रेरणा बन गया था।
                     मैंने सोचा, आज म मदल्ली जा रहा ह ाँ, अपनी मेहनत का फल लेने।
                                     ैं
                                                                    े
              लेमकन यह मडग्री मसफ मेरी नहीं है। यह उस बच्ची की है, उस गााँव क हेडमास्टर
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              रामदयाल की है, और उन सभी ग्रामीणों की है, मजन्होंने मुझ पर मवश्वास मकया।
              यह मडग्री उन सभी लोगों को सममपषत है, जो आज भी भारत क दूरस्थ कोनों म  ें
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              मशक्षा क मलए संघर् कर रहे हैं।
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                     मेरी पीएचडी की यात्रा मसफ एक शोध पररयोजना नहीं थी, बमल्क यह
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              आत्म-खोज की एक यात्रा थी। इन दो सालों म मने खुद को और अपने देश को
                                                     ैं
                                                   ें
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              बहुत करीब स समझा।
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