Page 176 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स अनार तक
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रात में, जब मैं सोने गया, तो मेर मन में बस एक ही मवचार था मक कल
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का मदन मर मलए एक नया सफर शुऱू करगा। एक ऐसा सफर, मजसमें मैं अपने
शोध को वास्तमवकता में बदल सकता था। और इस सफर में मेर साथ मेर दोस्त
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और मरा भाई थे। यह सोचकर मुझ बहुत सुकून ममला।
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यह कहानी मरी आत्मकथा का एक महत्वपूण अध्याय है, जो मुझ े
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हमेशा याद मदलाएगा मक सफलता की यात्रा में अकले चलना आसान नहीं है,
और सच्चे दोस्त और पररवार का साथ ही उस यात्रा को यादगार और सफल
बनाता है।
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ममत्रता और पररवार क संबल पर
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"सफलता की डगर पर अकल चलना मुममकन तो है, पर यादगार वही सफर
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होता है मजसमें अपनों का साथ और दोस्तों का हाथ होता है।"
"वह मडनर कवल भोजन नहीं, बमल्क संघर्ों की जीत का जश्न था; भाई
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और ममत्रों क साथ साझा की गई खुमशयों का एक नया पन्ना था।"
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आत्म-शांमत और शोध क संकल्प पर
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"कल की सुबह एक नई मज़म्मदारी लकर आने वाली थी—अपने शोध को
कागज़ों से मनकालकर वास्तमवकता की ज़मीन पर उतारने की।"
"जब लक्ष्य पमवत्र हो और साथ देने वाले अपने हों, तो मन में एक अजीब
सी शांमत और सुकून का वास होता है।"
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