Page 173 - आनंद से अनार तक
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                                आत्मकथा -आनंद स  अनार तक

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                     हम सभी अपने-अपने बग लकर प्लटफॉम पर पहुाँचे। रन का नाम
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                                                         ष
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              'मालवा एक्सप्रेस' था, जो हमार उत्साह और खुशी को और भी बढा रही थी।
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                                                                े
              हम सभी ने अपनी सीट पर बैठकर एक-दूसर को देखा। हमार चेहरों पर एक
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              अजीब सी चमक थी। यह चमक कवल यात्रा की नहीं, बमल्क एक सपने क सच
              होने की थी।
                     रल की यात्रा में मस्ती और पुरानी यादों का सर्फर
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                     रल की मखडकी से बाहर अाँधेरा छा रहा था, लेमकन हमार मडब्बे क
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                                                                            े
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              अंदर रोशनी और हाँसी का माहौल था। हमने अपनी सीट पर बठकर खूब बात  ें
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              की। हमने बचपन की शरारतों को याद मकया, स्कूल और कॉलज क मदनों की
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              कहामनयााँ सुनाई ं , और एक-दूसर क पैर खींचे।
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                     सुमर, जो मेरा भाई होने क साथ-साथ मेरा सबसे अच्छा दोस्त भी था,
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              उसने अपनी बचपन की एक शरारत भरी कहानी सुनाई, मजसम उसने मुझ फसा
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              मदया था। हम सब हाँस-हाँसकर लोटपोट हो गए।
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                     रात का खाना हमने साथ में खाया। रलगाडी में मबकने वाले खाने का
              स्वाद भल ही बहुत खास न हो, लेमकन दोस्तों क साथ ममलकर खाने का मज़ा
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              ही कुछ और था। हम सबने ममलकर पूमडयााँ, सब्ज़ी और अचार खाया और चाय
              की चुमस्कयााँ लीं।
                     जैसे-जैसे रात होती गई, हमारी बात और गहरी होती गई ं । हमने अपने
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              भमवष्य क सपनों पर चचाष की। मैंने उन्हें बताया मक मेरा लक्ष्य कवल पीएचडी
              की मडग्री लेना नहीं है, बमल्क म अपने शोध क आधार पर भारत क दूरस्थ गााँवों
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              म मशक्षा क क्षत्र म काम करना चाहता ह ाँ। मर दोस्तों ने मर इस सपने का पूरा
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              समथषन मकया। सोहन ने कहा, "हम आपक  साथ हैं। जब भी आपको हमारी
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              ज़ऱूरत हो, बस एक आवाज़ लगाना।"
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