Page 168 - आनंद से अनार तक
P. 168
आत्मकथा -आनंद स अनार तक
े
एक मदन, मैं एक गााँव में सवेक्षण कर रहा था, जहााँ एक छोटी सी बच्ची
े
े
े
ने मुझस पूछा, "सर” आप हमार मलए भी स्कूल बनाओग?" उसकी आाँखों में
े
ैं
े
एक आशा थी। वह सवाल मर मदल को छू गया। मुझ लगा मक म मसफ एक
े
ष
ररसचषर नहीं ह ाँ, म एक माध्यम ह ाँ, मजसकी ररपोट शायद इस बच्ची क भमवष्य
ष
ैं
े
को बदल सकती है।
इन दो वर्ों में, मैंने सीखा मक असली ज्ञान मकताबों में नहीं, बमल्क
जीवन क अनुभवों म होता है। मने यह भी सीखा मक धैयष और लगन मकसी भी
ें
ैं
े
मुमश्कल काम को आसान बना
े
े
सकत हैं। इन अनुभवों ने मुझ न
ष
मसफ एक बेहतर शोधकताष बनाया,
े
बमल्क एक बहतर इंसान भी
बनाया।
े
ें
जब मैं 2017 क अंत म अपना शोध कायष पूरा कर रहा था, तो मेर पास
े
कवल आंकड और तथ्य नहीं थे, बमल्क मेर पास उन ग्रामीणों की कहामनयााँ थीं,
े
े
े
े
े
े
उनक संघर्ों की दास्तान थी, और मर अपने अनुभव थे, मजन्होंने मेर शोध को
े
एक मज़बूत और मानवीय आधार मदया था।
अध्याय 4: बदलाव की कहानी और एक नई सुबह
ष
मेरा शोध कायष 2017 क अंत तक पूरा हो गया था, और मैंने अपनी ररपोट जमा
े
ष
ष
े
कर दी थी। लेमकन मेर मन में यह बात थी मक मेरा काम मसफ ररपोट जमा करने
तक सीममत नहीं रहना चामहए। मैंने डॉ. उमा गुप्ता से बात की और उनसे आग्रह
मकया मक मरी ररपोट को कवल अकादममक समुदाय तक ही सीममत न रखा जाए,
े
ष
े
बमल्क इस सरकार क संबंमधत मवभागों तक पहुाँचाया जाए।
े
े
158 | P a g e

