Page 167 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स अनार तक
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धीर-धीर, उनक मवश्वास ने मेर काम को आसान बनाया। मैंने गााँवों क
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बुज़ुगों, ममहलाओं और बच्चों स बात की। मने उनक रीमत-ररवाजों और मशक्षा
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स जुडी उनकी सोच को समझा। मने पाया मक अमशक्षा का एक बडा कारण यह
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भी था मक गााँवों में मशक्षा का मॉडल उनक जीवनशैली से मेल नहीं खाता था।
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पाठ्यक्रम शहरों क बच्चों क मलए बनाया गया था, जहााँ रोज़गार क अवसर और
जीवन की प्राथममकताएाँ अलग थीं।
नीमतयों और हकीकत का अंतर
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मर शोध का दूसरा बडा महस्सा सरकारी नीमतयों का अध्ययन करना
था। मैंने "मशक्षा का अमधकार अमधमनयम" (RTE) और अन्य सरकारी
योजनाओं की समीक्षा की। कागज़ पर ये नीमतयााँ बहुत अच्छी और प्रभावी
लगती थीं, लेमकन जब मैंने उन्हें गााँवों की ज़मीन पर देखा, तो उनका कायाषन्वयन
बहुत मनराशाजनक था।
फ ं ड की कमी, मशक्षकों का तबादला, और प्रशासमनक उदासीनता जैसी
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समस्याएं बहुत आम थीं। मने अपनी ररपोट म एक जगह मलखा, "सरकार की
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नीमतयााँ बहुत अच्छी हैं, लमकन जब तक इन नीमतयों को लागू करने वाल लोग
ज़मीनी हकीकत को नहीं समझेंगे, तब तक इन नीमतयों का लाभ दूरस्थ क्षत्रों तक
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नहीं पहुाँचेगा।"
व्यमिगत संघर्ष
ये दो साल मेर मलए शारीररक और मानमसक ऱूप से भी थकाने वाले
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थे। कई बार मुझ रात मबना मबजली क गुज़ारनी पडती थीं और खाना भी बहुत
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सादा ममलता था। मुझ मलररया और टाइफाइड भी हुआ, लेमकन मैंने हार नहीं
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मानी। मुझ अपने शोध क मवर्य स प्यार हो गया था। यह मसर्फ एक प्रोजक्ट नहीं
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था, यह मेरी पहचान बन गया था।
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