Page 164 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स अनार तक
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क हर शब्द में एक वादा था— एक ऐसे भारत का वादा, जहााँ हर बच्चे को मशक्षा
का समान अवसर ममले, चाहे वह गााँव में रहता हो या शहर में।
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मुझ पता था मक यह सर्फर आसान नहीं होगा। कागज़ी शोध और मदानी
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हकीकत म बहुत र्फक होता है। पर मर अंदर एक आग जल रही थी। यह आग
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मर अंदर वर्ों स सुलग रही थी, और अब इसे हवा ममल गई थी। मैं उत्सामहत था
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और चुनौमतयों का सामना करने क मलए तयार था।
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अध्याय 2: मैदानी शोध की शुरुआत - पहला कदम दूरस्थ गााँव की ओर
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मसनॉमप्सस की स्वीकृमत क बाद, मरी पहली चुनौती थी शोध क मलए
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उपयुि गााँव का चयन करना। डॉ. उमा गुप्ता ने सुझाव मदया मक म भारत क मध्य
भाग म मस्थत कुछ दूरस्थ और आमदवासी बहुल इलाकों का दौरा कऱू। मने मध्य
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प्रदेश क एक ऐस ही मज़ल को चुना, जहााँ आज भी कई गााँव ऐसे थे जहााँ सडक,
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मबजली और पीने क पानी जसी बुमनयादी सुमवधाए भी मुमश्कल स पहुाँच पाई
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थीं।
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म जून 2016 की शुरुआत म अपने बग म कुछ मकताब, एक नोटबुक
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और एक पुराना कमरा लकर ग्रामीण भारत क मलए मनकल पडा। वहााँ से मेरी
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यात्रा और भी कमठन हो गई। बस, जीप और मफर कई मकलोमीटर की पैदल यात्रा
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क बाद मैं अपने पहले गााँव, "बागली " पहुाँचा।
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पानी एक छोटा सा गााँव था, जो चारों तरर्फ स घने जंगल और पहामडयों
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स मघरा हुआ था। गााँव म मबजली नहीं थी और शाम होत ही सब कुछ अधेर म ें
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डूब जाता था। मुझ वहााँ एक स्थानीय स्कूल क हेडमास्टर क घर म रुकने की
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अनुममत ममली। उनका नाम रामदयाल था। रामदयाल जी ने मरा बहुत स्वागत
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मकया।
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