Page 159 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स अनार तक
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क ऱूप म भी मर अंदर सीखने की ललक अभी भी मज़ंदा है। मरी इस सफलता
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स मवश्वमवनॏयालय क मशक्षक भी बहुत प्रभामवत हुए।
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आरडीसी की तैयारी: एक नया अध्याय
कोसष वक की परीक्षा में सफल होने क बाद, रवींिनाथ टगोर
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मवश्वमवनॏयालय ने मुझ पीएचडी की अगली प्रमक्रया ररसचष मडग्री कमेटी (RDC)
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क मलए चयमनत कर मलया। यह मर मलए एक बहुत बडी चुनौती थी, क्योंमक मुझ े
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अब एक मसनोमप्सस (synopsis) तैयार करनी थी और उसे समममत क सामने
प्रस्तुत करना था। एक मसनोमप्सस म मर शोध का पूरा खाका होता, मजसमें शोध
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का मवर्य, उद्देश्य, शोध पद्मत और संभामवत पररणाम शाममल होत।
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मुझ पता था मक यह काम बहुत ही जमटल है और इसक मलए बहुत
ज़्यादा मेहनत और शोध की ज़ऱूरत होगी। मैं एक मशक्षक था, शोधकताष नहीं।
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लमकन मने हार नहीं मानी। मने अपने शोध क मवर्य को बहुत ध्यान स चुना:
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"ग्रामीण भारत में दूरस्थ अंचलों में मशक्षा को पहुाँचाना।" यह मवर्य मेर मदल क
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बहुत करीब था, क्योंमक मने खुद बचपन म मशक्षा पाने क मलए बहुत संघर् मकया
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था। म चाहता था मक मरा शोध मर व्यमिगत अनुभवों स जुडकर कुछ ऐसा
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समाधान दे जो ग्रामीण भारत में मशक्षा की मस्थमत को बेहतर बना सक।
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मसनोमप्सस तैयार करने क मलए मैंने मदन-रात एक कर मदया। मैंने कई मकताबें
पढीं, इंटरनेट पर शोध पत्र खोज, और कई मवशर्ज्ञों स सलाह ली। मुझ पता था
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मक मुझ न कवल एक अच्छा मसनोमप्सस तयार करना है, बमल्क उसे प्रभावशाली
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तरीक स प्रस्तुत भी करना है। मर मसनोमप्सस म मर शोध की पूरी ऱूपरखा थी:
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• शोध का पररचय: मजसम मने ग्रामीण मशक्षा की समस्याओं और इसक
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महत्व को बताया।
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