Page 163 - आनंद से अनार तक
P. 163
े
आत्मकथा -आनंद स अनार तक
वह मदन मुझ आज भी याद है, 12 अप्रैल 2016। दोपहर क ठीक तीन
े
े
े
े
े
बज थे और मर र्फोन की घंटी बजी। स्क्रीन पर मरी गाइड, डॉ. उमा गुप्ता का नाम
े
चमक रहा था। मदल की धडकनें तज़ हो गई ं । मने कांपत हाथों स कॉल उठाई।
े
े
े
ैं
"हेलो, मैम?" मेरी आवाज़ में घबराहट सार्फ थी।
दूसरी तरर्फ स डॉ. गुप्ता की गहरी, पर शांत आवाज़ आई, "ठाकुर”
े
तुम्हारी थीमसस का मसनॉमप्सस 'भारत क दूरस्थ ग्रामीण अंचल म मशक्षा का
े
ें
प्रचार-प्रसार' मवर्य पर स्वीकृत हो गया है। बधाई हो।"
ै
े
े
े
जस मकसी ने मर मसर पर ठंडा पानी डाल मदया हो। घबराहट की जगह
े
ख़ुशी की एक लहर दौड गई। मरी सालों की महनत, रात-रात भर जागकर मकए
े
े
गए शोध और आंकडों का मवश्लर्ण, सब कुछ साथषक हो गया था। यह मसफ
ष
े
एक मसनॉमप्सस की स्वीकृमत नहीं थी, यह मेर उस सपने की पहली सीढी थी,
मजसे मैं हमेशा से देखता आया था—भारत क उन बच्चों क मलए कुछ करना,
े
े
जो आज भी अच्छी मशक्षा स वंमचत हैं।
े
मने डॉ. गुप्ता को धन्यवाद मदया और र्फोन रखा। मरी आंखों म आंसू
ें
े
ैं
ष
े
आ गए थे। यह मेर मलए मसफ एक ररसचष प्रोजेक्ट नहीं था, यह एक ममशन था।
े
े
े
े
मरा जन्म एक छोट स गााँव म हुआ था, जहााँ स्कूल जाने क मलए कई मकलोमीटर
ें
पैदल चलना पडता था और अक्सर मशक्षक भी उपलब्ध नहीं होते थे। मैंने उस
े
ैं
संघर् को बहुत करीब स देखा था। यही वजह थी मक मने यह मवर्य चुना था। म ैं
ष
े
ष
मसफ मडग्री क मलए शोध नहीं करना चाहता था, म ज़मीन पर कुछ बदलाव लाना
ैं
चाहता था।
अगले मदन, मैं लाइब्रेरी गया और मसनॉमप्सस की कॉपी को देखकर
े
ख़ुश हुआ। अब मर सामने एक नया, बडा और चुनौतीपूण रास्ता था। मसनॉमप्सस
ष
े
153 | P a g e

