Page 166 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स अनार तक
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का संग्रह नहीं है, बमल्क यह उन मज़ंदमगयों की कहानी है मजन्हें म अपनी ररपोट ष
में शब्दों का ऱूप देने जा रहा था।
अगल कुछ महीनों म, मैंने कई और गााँवों का दौरा मकया। हर गााँव की
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अपनी अलग कहानी थी, लेमकन समस्याएाँ एक जैसी थीं— मशक्षकों की कमी,
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बुमनयादी सुमवधाओं का अभाव और सबस ज़ऱूरी, मशक्षा क प्रमत जागऱूकता
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की कमी।
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मरी डायरी अब मसर्फ नोट्स स नहीं, बमल्क कहामनयों और संघर्ों स े
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भर गई थी। मने महसूस मकया मक म एक ऐसी दुमनया म आ गया था जहााँ मकताबों
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क ज्ञान स ज़्यादा जीवन क अनुभव काम आत थे। और यही अनुभव मर शोध
की असली नींव बन रहे थे।
अध्याय 3: संघर्ष और सीख - वर्ष 2016-2017
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मेरा शोध कायष कवल फील्डवक तक सीममत नहीं था, बमल्क इसमें कई
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तरह क संघर् और सीखने क अनुभव भी शाममल थे। वर् 2016 और 2017 मेर े
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जीवन क सबसे कमठन और मेहनती वर्ष थे। मैं शहरों में अपनी ररसचष करता और
मफर गााँवों में जाकर उसकी वास्तमवकता जााँचता।
डाटा संग्रह की चुनौती
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गााँवों म डाटा इकठॎठा करना एक बडी चुनौती थी। ग्रामीण लोग अक्सर
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बाहर क लोगों पर आसानी स मवश्वास नहीं करत। मुझ कई हफ़्तों तक उनक साथ
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रहकर, उनक त्योहारों में शाममल होकर, और उनकी दैमनक मदनचयाष का महस्सा
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बनकर उनका मवश्वास जीतना पडा। मुझ याद है, एक गााँव म मुझ पहल मदन
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कवल यही सुनने को ममला, "कोई सर” आप भी आए हैं, और चले जाएाँगे।
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हमारा क्या भला होगा?" मने उनक इस संदेह को समझा और उनस कहा मक म ैं
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मसर्फ उनकी समस्याओं को समझने आया ह ाँ, तामक उन्हें सही जगह पहुाँचा सकू।
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