Page 180 - आनंद से अनार तक
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                                आत्मकथा -आनंद स  अनार तक

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              और कोई पंजाब स। हर चेहरा अपनी कहानी कह रहा था—वर्ों क शोध की
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                                                               े
              थकान और सफलता की चमक का ममश्रण। हमने एक-दूसर स बात की, अपनी
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              शोध यात्राओं क छोट-छोट मकस्स सुनाए, और यह महसूस मकया मक हम एक-
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              दूसर क संघर् क साथी हैं। यह क्षण कवल नाश्त का नहीं, बमल्क 'मविानों क
              ममलन' का था।
                     सुबह 10:20 बजे: दीक्षांत यूमनफॉमष (Crucial Detail) नाश्ते क बाद,
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              वह क्षण आया मजसका मुझ सबस अमधक इंतजार था—दीक्षांत समारोह की
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              यूमनफॉम (गाउन, स्टोल और टोपी) पहनना। एक सहायक ने मुझ मर साइज़ का
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              गहरा नीला गाउन और सुनहरा स्टोल मदया। जब मने उस औपचाररक वस्त् को
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              अपने शरीर पर डाला, तो मुझ लगा जस म अपनी पहचान क एक नए अध्याय
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              म प्रवश कर रहा ह ाँ। वह गाउन कवल कपडा नहीं था; वह मेर मशक्षकों क ज्ञान,
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              मेर शोध की सत्यमनष्ठा और मेर पररवार क बमलदान का प्रतीक था।
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                     बाहर, सुमर, सुरन्ि और सोहन खड थे। जब म गाउन पहनकर बाहर
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              आया, तो उनकी आाँखों में एक क्षण क मलए आियष और मफर गवष का एक गहरा
              भाव उतर आया।
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                     सोहन ने धीर से कहा, "यार, डॉक्टर साहब! आज तो आप एकदम
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              कुलपमत लग रहे हैं।" सुरन्ि ने मजाक म कहा, "आज सही में लग रहा है मक
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              हमारी दोस्ती मकसी बड आदमी से है।" सुमर ने बस मुस्कुराकर मुझ गल लगा
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              मलया। उसकी उस मुस्कान म, मेर गााँव, मेरी मााँ, और हमार संयुि संघर् की
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              सारी कहानी मछपी थी।
                     अध्याय 4: नवाचार, चांसलर और भव्य समारोह
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