Page 181 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स अनार तक
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सुबह 10:45 बजे: हॉल में प्रवेश अब हम मुख्य हॉल की ओर जाने का
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मनदेश ममला। मेर तीनों साथी दशषक दीघाष में अपनी सीट लेने चले गए, और मैं
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अन्य अवाडी क साथ हॉल में प्रवेश मकया।
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हॉल मवशाल और भव्य था। मंच को फूलों और रोशनी स सजाया गया
था। औपचाररक संगीत की धीमी धुन पूर हॉल म गूज रही थी। हमने अपनी-
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अपनी मनमदषि सीटों पर स्थान ग्रहण मकया।
सुबह 11:00 बजे: समारोह का आरंभ घडी ने जैसे ही 11 बजाया, हॉल
की लाइट्स धीमी हुई ं , और एक गंभीर संगीत क साथ अमतमथयों का औपचाररक
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जुलूस मंच की ओर बढा। चांसलर और डॉक्टरल मोमनटररंग बोड क सदस्यों ने
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मंच पर अपना स्थान ग्रहण मकया।
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इसक बाद समारोह की कायषवाही शुऱू हुई। सबस पहल, मेर शोध क
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किीय मवर्य 'मशक्षा क क्षेत्र में नवाचार' पर एक संमक्षप्त विव्य मदया गया। मने
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अपनी आख बंद कीं और अपने शोध की यात्रा को याद मकया—वह मवचार, वे
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आाँकड, वे साक्षात्कार, और वे अनमगनत रातें जब मैंने अपने देश क शैमक्षक
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पररदृश्य को बदलने का सपना देखा था। मेरी उपामध कवल एक कागज़ नहीं थी,
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यह उस नवाचार क बीज का प्रमाण था मजसे मैं अब वास्तमवकता में बदलना
चाहता था।
अध्याय 5: सम्मान की वेदी पर: अमतमथयों क कर-कमलों से
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अगला क्षण वह था, मजसने मर जीवन की मदशा बदल दी। मंच पर
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प्रमतमष्ठत अमतमथयों का आह्वान मकया गया, मजनक कर-कमलों से हमें सम्मामनत
होना था।
मंच पर उपमस्थत थे:
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