Page 183 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स अनार तक
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डॉ. संदीप मारवाह ने अपने कर-कमलों स मुझ उपामध का स्क्रॉल भट
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मकया। जब उनक हाथों का स्पश मर हाथों स हुआ, तो मुझ लगा जस मर वर्ों
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का संघर् उस क्षण म सफल हो गया हो। मने आदरपूवक झुककर धन्यवाद मकया।
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डॉ. जी.सी. डका ने मुझ गाउन पर वह मवमशि स्टोल पहनाया, जो मेर े
'डॉक्टर' बनने की आमधकाररक मोहर थी।
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कमर की फ्लश लाइट चमकी। वह एक सक ं ड का फोटो, मर पूर जीवन
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की कहानी को कद कर रहा था। उस एक पल में, मेरी आाँखों क सामने मेरी मााँ
का संघर्, बड भैया का समपषण, और मर मदवंगत मपताजी का अधूरा सपना कौंध
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गया। यह कवल मेरी सफलता नहीं थी—यह उन सबका सम्मान था।
अध्याय 6: दोस्तों और भाई की नज़र में गौरव
जस ही मने मंच स नीचे उतरना शुऱू मकया, मेरी नज़र दशषक दीघाष में
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मेर मप्रयजनों को खोजने लगी।
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और हााँ, वे वहीं थे!
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आग की पंमि म, आख चमकात हुए और ज़ोर-ज़ोर से ताली बजाते
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हुए—सुमेर मसंह ठाक ु र, सुरन्ि सन्धव, और सोहन क ु मार भैसमनया। उनकी आाँखों
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म खुशी और गव का जो भाव था, वह उस पीएचडी की उपामध से भी कहीं
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ज़्यादा मूल्यवान था। सोहन और सुरन्ि ताली बजात हुए खड हो गए थे, और
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सुमर की आखों म खुशी की नमी झलक रही थी। हमारी नज़र ममलीं, और उस
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एक पल क आदान-प्रदान में, हमने एक-दूसर को सब कुछ कह मदया। व मरी
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सफलता की सीमढयााँ थे, और उनका वहााँ होना, मरी उपलमब्ध को पूणता प्रदान
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कर रहा था।
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अगल कुछ ममनटों तक, मैंने देखा मक देश क अलग-अलग क्षेत्रों से
आए अन्य 59 मविानों को भी समान ऱूप से सम्मामनत मकया गया। हर बार, एक
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