Page 188 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स अनार तक
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धूप म और भी मदव्य लग रही थी। चारों ओर स आत कीतन की मधुर ध्वमन,
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वातावरण म एक अजीब सी शांमत घोल रही थी।
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हम तीनों दोस्त और सुमर मसंह, सरोवर क मकनार बैठ गए। मैंने अपनी
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आख बंद कर लीं। कुछ ही मदन पहल म मदल्ली क एक भव्य मंच पर पीएचडी
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की उपामध पा रहा था, और आज मैं यहााँ, ईश्वर क दरबार में, ज़मीन पर बैठा था।
इस मवपरीत पररमस्थमत ने मुझ एक गहरा सबक मसखाया—वास्तमवक ज्ञान और
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उपलमब्ध, मवनम्रता और अध्यात्म में मनमहत है।
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हमने मंमदर क अंदर प्रवश मकया। वहााँ का माहौल, भिों की श्रद्ा और
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लगातार होत कीतन ने हम अमभभूत कर मदया। लंगर हॉल म जाकर प्रसाद ग्रहण
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करना भी एक यादगार अनुभव था। हज़ारों लोगों का एक साथ, मबना मकसी
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भेदभाव क, साधारण भोजन करना—यह समानता और सेवा क मसख मसद्ांतों
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का सबसे बडा प्रमाण था।
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सोहन भसमनया ने मुझ धीर स कहा, "डॉक्टर साहब, यहााँ आकर लग
रहा है मक हमने जो कुछ भी हामसल मकया है, वह इसी शांमत को पाने क मलए
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मकया है।"
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स्वण मंमदर की शांमत ने हमार अंदर की भाग-दौड को शांत कर मदया,
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और हम एहसास कराया मक ज्ञान का सवोच्च लक्ष्य आमत्मक शांमत और लोक-
सेवा है।
अध्याय 4: वाघा बॉडर: शौयष, देश प्रेम और देशभमि का सैलाब
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19 मदसंबर 2018, शाम 4:00 बजे: अमृतसर की यात्रा का सबस े
रोमांचक और ऊजाष स भरा अनुभव था—वाघा-अटारी सीमा पर होने वाली
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बीमटंग रररीट सरमनी देखना।
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