Page 189 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स अनार तक
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हम मनधाषररत समय स पहल ही बॉडर पर पहुाँच गए थे। वहााँ का नज़ारा
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अमवश्वसनीय था। भारत माता की जय और वंदे मातरम् क नारों स पूरा स्टमडयम
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गूज रहा था। हज़ारों लोग अपने हाथों म मतरंगा मलए हुए, देशभमि क ज्वार में
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डूब हुए थे।
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हम सुरन्ि कुमार क कारण वी.आई.पी. गलरी क पास बठने का अवसर
ममला।
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जब परड शुऱू हुई, तो एक मबजली सी दौड गई। भारतीय सीमा सुरक्षा
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बल (BSF) क जवानों का जोशीला माचष, उनक ऊचे कदम और उनक चेहर े
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पर देश क मलए मर-ममटने का जुनून, हर भारतीय को गवष से भर रहा था।
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जब BSF और पामकस्तानी रजसष क बीच 'बीमटंग रररीट' की रस्म शुऱू
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हुई, तो पूरा माहौल 'भारत माता की जय' और 'महंदुस्तान मज़ंदाबाद' क नारों से
फट पडा।
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मेर और मेर दोस्तों क रोंगटे खड हो गए थे। उस पल, मुझ अपनी
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पीएचडी उपामध का गौरव भी छोटा लगने लगा। मने महसूस मकया मक वास्तमवक
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सम्मान और गौरव तो इन जवानों का है, जो हर पल देश की रक्षा क मलए अपनी
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जान दााँव पर लगाते हैं।
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मने सुमर, सुरन्ि और सोहन को देखा। हम सब एक ही ऊजाष स भर हुए
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थे।
सुरन्ि सधव ने जोश म भरकर कहा, "कसम से, आज पहली बार समझ
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आया मक हमारा देश मकतना महान है!" सोहन ने अपनी आख पोंछत हुए कहा,
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"डॉक्टर साहब, यह देशभमि का नज़ारा... कभी नहीं भूलूगा।"
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उस शाम, सूरज भारत-पामकस्तान सीमा पर डूब रहा था, लेमकन हमार े
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मदल म देश क मलए प्यार का एक नया सूरज उदय हो चुका था। हमने महसूस
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